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नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण आपदा, 1050 से अधिक लोग मारे गए

नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में एक ग्लेशियर के टूटने से भीषण प्राकृतिक आपदा आई है, जिसमें 1050 से अधिक लोग मारे गए हैं और 3900 लोग लापता हैं। इस आपदा ने कई बस्तियों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। भारतीय पर्यटक भी प्रभावित हुए हैं, और चीन ने नए भूस्खलन की चेतावनी दी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ऐसी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। राहत और बचाव कार्य जारी हैं, लेकिन ऊपरी पहाड़ी क्षेत्रों में अस्थिरता के कारण खतरा बना हुआ है।
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प्राकृतिक आपदा का कहर

काठमांडू - नेपाल के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में एक ग्लेशियर के टूटने से भयंकर प्राकृतिक आपदा उत्पन्न हुई है, जिसने व्यापक तबाही मचाई है। लगभग 5200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक ढह गया, जिसके परिणामस्वरूप बर्फ, पानी, चट्टानों और मलबे का एक तेज सैलाब नीचे की ओर बढ़ा। इस आपदा ने कई बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।


मौतों और लापता लोगों की संख्या

रिपोर्टों के अनुसार, इस आपदा में अब तक 1050 से अधिक लोगों की जान चली गई है, जबकि लगभग 3900 लोग लापता हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 लोगों की मौत और 546 लोग लापता होने की खबरें आई हैं, हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।


भारतीय पर्यटकों पर असर

इस प्राकृतिक आपदा ने नेपाल में मौजूद विदेशी नागरिकों और पर्यटकों को भी प्रभावित किया है। रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 133 भारतीय नागरिक लापता हैं, जिनमें से कई कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग पर थे। सीमा जांच चौकी के पास खड़े 300 से अधिक वाहन और ट्रक भी बाढ़ के तेज बहाव में बह गए।


चीन की चेतावनी

आपदा के बाद प्रभावित क्षेत्र में जमा पानी का अधिकांश हिस्सा निकल चुका है और कई स्थानों पर नदियों का प्रवाह सामान्य होने लगा है। फिर भी, खतरा पूरी तरह से टला नहीं है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों और ग्लेशियरों की अस्थिर स्थिति को लेकर चेतावनी जारी की है।


भूस्खलन का खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियर के टूटने और भारी भूस्खलन के कारण नदियों के रास्ते में मलबे के अस्थायी बांध बन सकते हैं। यदि ये बांध अचानक टूटते हैं या ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फिर से भूस्खलन होता है, तो एक और बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है।


मलबे का सैलाब

सूत्रों के अनुसार, 26 अगस्त को नेपाल के लांगटांग लिरुंग क्षेत्र में एक बड़ा ग्लेशियर टूटकर नीचे गिरा। इसके बाद, बर्फ, पानी, चट्टानों और मलबे का सैलाब लगभग 50 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नीचे की ओर बढ़ा और 20 किलोमीटर से अधिक दूरी तक फैल गया।


जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है, जिससे ग्लेशियर झीलों के फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है।


राहत और बचाव कार्य

नेपाल के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। देश की कई बस्तियां, सड़कें और पनबिजली परियोजनाएं संकरी नदी घाटियों में स्थित हैं, जिससे ऐसी आपदाओं में नुकसान का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। फिलहाल, राहत और बचाव दल प्रभावित क्षेत्रों में मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश में जुटे हैं, लेकिन ऊपरी पहाड़ी क्षेत्रों में अस्थिर स्थिति के कारण बचाव अभियान के दौरान भी खतरा बना हुआ है।