पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी: पंजाब के महान क्रांतिकारी का जीवन और योगदान
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी का जन्मदिन मनाने का संकल्प
30 सितंबर को पंजाब के सभी मंदिरों में उनका जन्मदिन मनाकर उनके जीवन से प्रेरणा लें समाज
फरीदकोट: स्थानीय महामृत्युंजय महादेव मंदिर में पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी जी के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित विचार गोष्ठी में धर्म जागरण समन्वय के प्रमुख रामगोपाल जी ने कहा कि पंडित श्रद्धाराम शर्मा पंजाब के जालंधर जिले के एक महान क्रांतिकारी थे। अठारहवीं शताब्दी में वे लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिनचंद पाल के समकक्ष थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ये सभी उनके प्रेरणा स्रोत रहे होंगे। उनकी तुलना राष्ट्रगीत 'वन्देमातरम' के रचयिता बंकिमचंद से की जा सकती है। जैसे उन्होंने 'वन्देमातरम' लिखा, जो क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बना, उसी प्रकार 'ॐ जय जगदीश हरे' की रचना कर उन्होंने हिंदू समाज के एकता और जागरण का अद्भुत कार्य किया। यह आरती देशभक्तों की प्रेरक आरती बन गई और आज भी विश्वभर में हिंदू समाज द्वारा पूजा-पाठ में गाई जाती है।
रामगोपाल जी ने बताया कि श्रद्धाराम शर्मा का जन्म 30 सितंबर 1837 को जालंधर जिले के फिल्लौर में हुआ था। उनके पिता जयदयाल एक अच्छे ज्योतिषी और सनातनी पुरोहित थे। श्रद्धाराम ने छोटी उम्र में ही गुरुमुखी, हिंदी, उर्दू और फारसी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। धार्मिक संस्कारों के कारण उन्होंने धार्मिक साहित्य का अध्ययन किया।
उन्होंने भारतीय राष्ट्र की आत्मा धर्म को मानते हुए सनातन धर्म के प्रचार में योगदान दिया। वे हिंदी और गुरुमुखी के एक अच्छे साहित्यकार थे और बहुत कम उम्र में कई साहित्य रचनाएँ की। उनकी देशभक्ति ने उन्हें आर्य समाज से जोड़ा। 'ॐ जय जगदीश हरे' को आधार बनाकर उन्होंने गांव-गांव में भजन गाए और एक लोकप्रिय हिंदी रचना बनाई।
श्रद्धाराम ने उपनिषद, पुराणों, महाभारत और रामायण का अध्ययन किया। उन्हें यह पता था कि भारतीय राष्ट्र-धर्म में 'हिंदू राष्ट्र' की आत्मा 'धर्म' है। उन्होंने 'ॐ जय जगदीश हरे' को भारत का आराध्य गीत बना दिया। जैसे बालगंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को, बिपिनचंद पाल ने दुर्गापूजा को और लाला लाजपत राय ने रामलीला को शुरू किया, उसी प्रकार 'ॐ जय जगदीश हरे' ने देशभक्ति को जगाने का कार्य किया।
वे गुरुमुखी भाषा के जनक माने जाते हैं और हिंदी का पहला उपन्यास 'भाग्यवती' लिखने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ धार्मिक आयोजनों के माध्यम से जन जागरण शुरू किया। उनके अनुयायी चारों ओर फैल गए, जिससे ब्रिटिश सरकार की नींद हराम हो गई।
आज भी 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती हर मंदिर में गाई जाती है। यह रचना 150 वर्षों में इतनी लोकप्रिय हो गई है कि जैसे करपात्री जी द्वारा रचित उद्घोष 'धर्म की जय हो'। श्रद्धाराम की मृत्यु 24 जून 1881 को लाहौर में हुई।
इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. निर्मल कौशिक ने पंडित जी के कार्यों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में शहर के प्रसिद्ध सामाजिक और धार्मिक नेता उपस्थित रहे और सभी ने तय किया कि 30 सितंबर को उनका जन्मदिन अपने मोहल्ले के मंदिर में मनाएंगे।
