पराली जलाने की समस्या का समाधान: गडकरी का बड़ा बयान
पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रीय मंत्री का जोर
नई दिल्ली - केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने मंगलवार को दिल्ली विधानसभा के पहले स्पीकर चार्टी लाल गोयल की 99वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि देश में पराली जलाने की समस्या अब समाप्ति की ओर है। इससे इथेनॉल और बायो-सीएनजी का उत्पादन किया जा रहा है, और आने वाले समय में यह समस्या पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।
गडकरी ने कहा कि किसी व्यक्ति की उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसने अपने जीवन में क्या किया और समाज के लिए उसका योगदान क्या रहा। हर व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है, और यह एक सार्वभौमिक सत्य है। किसी का मूल्यांकन उसके जीवन की अवधि से नहीं, बल्कि उसके जीवन के उद्देश्य और तरीके से होना चाहिए।
कार्यक्रम में उन्होंने उस स्थान के परिवर्तन की भी सराहना की, जहां पहले कबाड़ का ढेर था, और अब उसे एक सुंदर बगीचे में बदल दिया गया है। इसे कबाड़खाने के कायाकल्प का एक उदाहरण बताते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के बदलाव समाज और पर्यावरण दोनों के लिए सकारात्मक हैं।
गडकरी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से वह पारिस्थितिकी और पर्यावरण के क्षेत्र में बड़े स्तर पर कार्य कर रहे हैं। आज मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पर्यावरण का निरंतर क्षरण है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी की रक्षा करना हर व्यक्ति का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए। वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए उन्होंने कहा कि ये तीनों प्रदूषण के रूप लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं और जीवन प्रत्याशा को कम कर रहे हैं।
दिल्ली के प्रदूषण का उल्लेख करते हुए गडकरी ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी को लंबे समय तक प्रदूषण की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा है, लेकिन अब स्थिति में सुधार आ रहा है।
उन्होंने पराली जलाने की समस्या पर भी प्रकाश डाला। पहले पंजाब और हरियाणा में बड़े पैमाने पर पराली जलाने के कारण दिल्ली के प्रदूषण पर असर पड़ता था। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा पर आधारित नीतियों को बढ़ावा दिया है। अब पराली को कचरे के बजाय एक उपयोगी संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। इसका उपयोग गैस बनाने के साथ-साथ सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (एसएएफ) तैयार करने में भी किया जा रहा है। इस तरह की पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों और अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभकारी साबित हो सकती है।
