पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा
पार्टी के भीतर विवाद की शुरुआत
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस में संगठन को लेकर विवाद अब चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। पार्टी ने आयोग के समक्ष अपने पक्ष को स्पष्ट करते हुए कहा कि वर्तमान संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह से वैध है और इसका कार्यकाल 2027 तक जारी रहेगा। वहीं, बागी गुट का कहना है कि मौजूदा नेतृत्व का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। इस मुद्दे ने राज्य की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है।
पार्टी का संविधान और कार्यकाल
तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को दिए अपने जवाब में कहा कि पार्टी के संविधान के अनुसार संगठनात्मक समितियों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। पार्टी का कहना है कि 2022 में हुए संगठनात्मक चुनावों के बाद मौजूदा समिति का कार्यकाल 2027 तक प्रभावी रहेगा, इसलिए बागी गुट का दावा गलत है।
संविधान में संशोधन का उल्लेख
पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि समय-समय पर संविधान में संशोधन किए गए हैं। पहले कार्यकाल तीन वर्ष का था, जिसे 2000 में चार वर्ष और 2006 में बढ़ाकर पांच वर्ष किया गया। इन सभी परिवर्तनों की जानकारी चुनाव आयोग को पहले ही दी जा चुकी थी, इसलिए वर्तमान समिति पूरी तरह वैध है।
बागी नेताओं के तर्कों पर सवाल
तृणमूल कांग्रेस ने बागी नेताओं के तर्कों पर भी सवाल उठाए। पार्टी का कहना है कि यदि उनका दावा सही है, तो उन नेताओं ने 2026 का विधानसभा चुनाव पार्टी के चुनाव चिन्ह और अधिकृत हस्ताक्षर के आधार पर कैसे लड़ा। पार्टी ने इसे उनके दावों में विरोधाभास बताया।
विशेष अधिवेशन की वैधता पर सवाल
पार्टी ने 22 जून को बागी गुट द्वारा आयोजित विशेष अधिवेशन को असंवैधानिक बताया। तृणमूल का कहना है कि इस बैठक में संगठन की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। न तो जनप्रतिनिधियों को सूचना दी गई और न ही आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा किया गया। इसलिए इस बैठक के निर्णयों की कोई वैधानिक मान्यता नहीं है।
चुनाव आयोग की कार्रवाई
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं और संगठनात्मक चुनावों से संबंधित दस्तावेज मांगे हैं। तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि आयोग को संविधान में हुए सभी संशोधनों की जानकारी पहले से उपलब्ध है। अब आयोग दोनों पक्षों के दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद आगे की प्रक्रिया तय करेगा।
