पूर्व DGP एसपी वैद्य ने नीट आंदोलन केस वापस लेने पर जताया विरोध
नीट पेपर लीक विवाद पर पूर्व DGP का कड़ा बयान
नई दिल्ली: नीट पेपर लीक के मामले में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्ज सभी एफआईआर को वापस लेने के निर्णय पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) एसपी वैद्य ने तीव्र असहमति व्यक्त की है। उन्होंने केंद्र सरकार के अनुरोध और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामलों को रद्द करने के कदम को सरकार का 'सरेंडर' बताया। वैद्य ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि कानून-व्यवस्था के साथ इस तरह का समझौता देश के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है, जिससे भविष्य में अराजकता का खतरा बढ़ सकता है।
पुलिस की स्थिति पर सवाल उठाते हुए
पूर्व DGP ने कहा कि 20 जुलाई को 'संसद चलो' मार्च के दौरान लगभग 150 से 200 पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे और सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचा था। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सभी मामले वापस ले लिए जाते हैं, तो घायल पुलिसकर्मियों और नष्ट की गई संपत्तियों का जिम्मेदार कौन होगा? वैद्य ने व्यंग्य करते हुए पूछा कि क्या अब पुलिस को अराजकता फैलने पर एफआईआर दर्ज करने से पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी? उन्होंने कहा कि ऐसे निर्णयों से देशभर के पुलिस बल का मनोबल गिरता है और उन्हें पूरी तरह से लाचार बना दिया जाता है।
आंदोलन के नेताओं पर कड़ी टिप्पणी
एसपी वैद्य ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठन सीजेपी पर तीखा हमला करते हुए उन्हें 'दिमागी नक्सल' करार दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस की जांच में प्रदर्शन के दौरान 3,000 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की उपस्थिति का पता चला था, लेकिन सरकार और अदालत के रुख के कारण उन सभी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियां भी समाप्त कर दी गईं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नई एफआईआर दर्ज करने के सुझाव पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जब पुरानी कानूनी कार्रवाई सही थी, तो उसे रद्द कर नया केस दर्ज करने का क्या औचित्य है? इस तरह के रवैये से उपद्रवियों को यह संदेश मिलता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं।
झारखंड के छात्रों के प्रति भेदभाव का आरोप
दिल्ली और अन्य राज्यों में हो रहे भेदभाव पर नाराजगी व्यक्त करते हुए पूर्व DGP ने दोहरे मापदंडों का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि रांची में अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया और गंभीर मुकदमे दर्ज किए गए, लेकिन न तो सरकार ने उनकी स्थिति पर ध्यान दिया और न ही अदालतों ने उन मामलों को खत्म करने की बात की। वैद्य ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे देश में दो तरह के कानून हैं—एक दिल्ली के उपद्रवियों के लिए और दूसरा सामान्य छात्रों के लिए। उन्होंने शीर्ष अदालत और केंद्र सरकार से इस गलत प्रवृत्ति को तुरंत रोकने की अपील की।
