पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने फॉर्म-6 में बदलाव को बताया अवैध
फॉर्म-6 में बदलाव पर गंभीर आपत्ति
नई दिल्ली। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने बुधवार को कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में किए गए संशोधन 'पूरी तरह गलत और अवैध' हैं। उन्होंने निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेदों को गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
एक अंग्रेजी दैनिक की रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बिना उनकी जानकारी के जारी किए गए आदेशों पर बार-बार आपत्ति जताई थी। रावत ने कहा कि निर्वाचन आयोग में ऐसी स्थिति 'शायद ही कभी' उत्पन्न हुई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि मतदाता सूची का सॉफ्टवेयर क्षेत्रीय अधिकारियों के निर्णयों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। रिपोर्ट में बताया गया है कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाताओं के पंजीकरण और नाम हटाने से संबंधित मुद्दों पर आपत्ति दर्ज की।
रावत ने कहा कि यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि निर्णय हमेशा सर्वसम्मति से लिए जाते थे। उन्होंने एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के माध्यम से एक ऐसी व्यवस्था की आलोचना की, जो मतदाताओं में डर पैदा कर रही है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि फॉर्म-6 में बदलाव के संबंध में उठाई गई आपत्तियां गंभीर हैं, क्योंकि निर्वाचन पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता।
जोशी ने मई में अपनी आपत्ति में कहा था कि एसआईआर के लिए जारी निर्देशों के माध्यम से फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया जा सकता और 'कानूनी रूप से टिकाऊ' रास्ता यही होगा कि नियमों में संशोधन के लिए प्रस्ताव सरकार को भेजा जाए। संधू ने भी इस पर सहमति जताई थी। हालांकि, बाद में ऑनलाइन फॉर्म-6 में नए मतदाता आवेदनों को एसआईआर से जोड़ने वाली एक घोषणा शामिल कर दी गई।
रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में संधू ने आपत्ति दर्ज कराई कि यह बदलाव 'अनधिकृत और अवैध' है और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। रावत ने कहा कि निर्वाचन आयुक्तों ने जो कहा है कि फॉर्म-6 में गलत तरीके से संशोधन किया गया, कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं है, उनकी राय नहीं ली गई और कोई बैठक नहीं हुई- ये गंभीर आरोप हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह फॉर्म-6 में संशोधन किया गया है, वह गलत है। यह पूरी तरह गलत और अवैध है।
उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस पर नियंत्रण को केंद्रीकृत किए जाने की भी आलोचना की। रिपोर्ट के अनुसार, स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र की निगरानी में बदलाव को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन से अलग-अलग संपर्क किया। रावत ने कहा कि यदि सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया गया है कि क्षेत्रीय अधिकारी किसी बदलाव को जरूरी मानते हों, लेकिन वे असहाय हों क्योंकि सॉफ्टवेयर उन्हें बदलाव करने की अनुमति नहीं देता, तो यह पूरी तरह अवैध और गलत है।
उन्होंने कहा कि किसी को भी सभी शक्तियों पर एकाधिकार रखने और यह कहने का अधिकार नहीं है कि हम सॉफ्टवेयर बनाएंगे और सॉफ्टवेयर जो कहेगा, वही करना होगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और ऐसा कभी होना भी नहीं चाहिए। रावत ने कहा कि इन घटनाक्रमों से एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच निर्वाचन आयोग पर जनता के भरोसे को और नुकसान पहुंचने का खतरा है।
उन्होंने कहा कि जिस संस्था पर लोगों ने भरोसा किया है और जिसने हमेशा स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराए हैं, उस पर उनका भरोसा पूरी तरह टूटता जा रहा है। रावत ने कहा कि संवैधानिक संस्था के सदस्यों के रूप में दोनों निर्वाचन आयुक्तों की भी जिम्मेदारी थी कि वे उन कार्रवाइयों को रोकें जिन्हें वे अनुचित मानते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि वे 10 महीने तक चुप क्यों रहे। उन्होंने पहले यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया? वे भी एक संवैधानिक संस्था के पदाधिकारी हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि एक भी गलती न होने दें। संधू और जोशी में से किसी ने भी सामने आए मतभेदों या अपनी आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से संचालित किया जाना जरूरी है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाता है। बहरहाल, निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने बुधवार को कहा कि एसआईआर से जुड़े फैसलों समेत आयोग के सभी फैसले मतभेदों के बावजूद सर्वसम्मति से और तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे。
