बिहार में बाढ़ से 27 लाख लोग प्रभावित, मानसून की स्थिति में असामान्य बदलाव
बिहार में बाढ़ की गंभीर स्थिति
नई दिल्ली। मानसून के अंतिम चरण में मौसम ने देश के कई हिस्सों में अजीब स्थिति उत्पन्न कर दी है। सैटेलाइट चित्रों में भारत के बड़े भागों में बादल छंटते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस बदलते मौसम के बीच बिहार में नदियों का जलस्तर बढ़ गया है, जिससे 13 जिलों में लगभग 27 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हो गए हैं। एक ओर जहां मानसून कमजोर पड़ने के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और नदियों के उफान ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कई हिस्सों में बादलों की मौजूदगी कम हो गई है, जिसे मानसूनी गतिविधियों के कमजोर होने का संकेत माना जा रहा है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देश के सभी हिस्सों में बारिश समाप्त हो गई है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय मौसम प्रणालियों के कारण अभी भी तेज बारिश हो रही है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य
बिहार में नदियों का उफान
बिहार में गंगा और अन्य नदियों के बढ़ते जलस्तर ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। गंगा, कोसी, गंडक, बागमती और पुनपुन जैसी नदियां कई स्थानों पर खतरे के निशान के ऊपर बह रही हैं। प्रशासन ने राहत और बचाव कार्यों को तेज कर दिया है, जिसमें बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 1,429 नावें और 190 सामुदायिक रसोई स्थापित की गई हैं। कुछ स्थानों पर जलस्तर में गिरावट के संकेत मिले हैं, लेकिन कई जगहों पर खतरा अभी भी बना हुआ है।
दिलचस्प बात यह है कि सितंबर में बिहार में सामान्य से अधिक बारिश हुई है। 7 सितंबर तक राज्य में 69.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से लगभग 55 प्रतिशत अधिक है। इसी अतिरिक्त बारिश और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने बाढ़ की स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
महाराष्ट्र में बारिश का रिकॉर्ड
अंबोली में भारी बारिश
वहीं, महाराष्ट्र के अंबोली में इस मानसून में भारी बारिश का दौर देखने को मिला है। अंबोली, जो पश्चिमी घाट में स्थित है, देश के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है और यहां की बारिश कई बार चेरापूंजी जैसे प्रसिद्ध क्षेत्रों को भी पीछे छोड़ देती है। हालांकि, अंबोली में 250 इंच बारिश और सितंबर तक 400 इंच के आंकड़े को किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि किए बिना निश्चित आंकड़े के रूप में नहीं लिया जा सकता।
अल नीनो का प्रभाव
मौसम में बदलाव का कारण
मौसम में इस तरह का विरोधाभास केवल बारिश की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके वितरण से भी संबंधित है। मानसून के दौरान कुछ क्षेत्रों में कम बारिश होती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में थोड़े समय में बहुत अधिक वर्षा होती है। इससे कहीं सूखे जैसी स्थिति बनती है तो कहीं बाढ़ आ जाती है। मौसम विशेषज्ञ मानसून के बदलते पैटर्न को समुद्र की सतह के तापमान और प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो परिस्थितियों से जोड़कर देख रहे हैं। यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि अब मानसून का प्रभाव केवल इस बात से तय नहीं होता कि देश में कुल कितनी बारिश हुई, बल्कि यह भी कि बारिश कहां हुई, कितनी देर में हुई और उसके बाद मौसम कितनी तेजी से बदला।
