बोफोर्स घोटाले का मामला समाप्त, सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम याचिका खारिज की
बोफोर्स घोटाले का अंत
बोफोर्स घोटाले के चलते 1989 का चुनाव हार गए थे राजीव गांधी
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के निर्णय के खिलाफ दायर अंतिम अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले में आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता की स्थगन की मांग को अस्वीकार करते हुए मामले की अंतिम याचिका को खारिज कर दिया।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 वर्षों तक अदालतों और भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय रहा। बोफोर्स केस लंबे समय तक सुर्खियों में रहा, लेकिन अदालत में यह टिक नहीं सका। इसकी मुख्य वजह जांच और सबूतों में खामियां थीं।
सीबीआई द्वारा पर्याप्त सबूतों की कमी
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2005 के अपने निर्णय में कहा कि सीबीआई आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत नहीं पेश कर सकी। आरोप तो लगाए गए, लेकिन उन्हें किसी आरोपी से सीधे जोड़ने वाली कड़ी नहीं मिली। जांच में सीबीआई को स्वीडन से जो दस्तावेज मिले, वे असली नहीं थे और ठीक से सत्यापित भी नहीं किए गए थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे दस्तावेजों के आधार पर किसी को आरोपी बनाना उचित नहीं है।
गवाहों की अनुपलब्धता
कमीशन का आरोप था, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि जो धन मिला, वह सीधे इस डील से संबंधित था या किसी आरोपी तक पहुंचा। जांच और कानूनी प्रक्रिया में वर्षों की देरी हुई, जिससे न केवल सबूत कमजोर पड़े, बल्कि कई महत्वपूर्ण गवाह और आरोपी भी समय के साथ अनुपलब्ध हो गए। इससे केस की विश्वसनीयता पर असर पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट की हैरानी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचाव पर आश्चर्य व्यक्त किया। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई के बीच यह क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं? बेंच ने स्पष्ट किया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है।
बोफोर्स घोटाले का इतिहास
यह मामला 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपए की तोप खरीद डील से संबंधित है। 1987 में यह खुलासा हुआ कि इस सौदे को हासिल करने के लिए कथित रूप से कमीशन (रिश्वत) दिया गया। घोटाले के आरोपों के चलते राजीव गांधी 1989 का चुनाव हार गए थे।
वीपी सिंह का इस्तीफा
राजीव गांधी की अगुवाई में 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 404 सीटें जीती थीं। उन्होंने 5 साल 32 दिन प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। बोफोर्स डील में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते राजीव सरकार में रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह ने 12 अप्रैल 1987 को इस्तीफा दे दिया।
स्वीडन की मीडिया का दावा
इस्तीफे के चार दिन बाद 16 अप्रैल 1987 को स्वीडन के रेडियो में खबर आई कि भारत के साथ हुए रक्षा सौदे में घूसखोरी हुई है। स्वीडन की मीडिया ने दावा किया कि डील के लिए एबी बोफोर्स कंपनी ने भारत सरकार के बड़े नेताओं और रक्षा विभाग के अधिकारियों को 60 करोड़ की घूस दी है।
कारगिल युद्ध में बोफोर्स की भूमिका
कारगिल युद्ध (1999) में बोफोर्स तोप ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण बढ़त दिलाई। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में छिपे पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक और लगातार हमले किए गए। इसकी लंबी रेंज और ऊंचाई से फायर करने की क्षमता ने दुश्मन की सप्लाई लाइन को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
