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बोफोर्स तोप सौदा घोटाले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स तोप सौदा घोटाले से संबंधित अंतिम याचिका को खारिज कर दिया है, जिससे लगभग चार दशकों से चल रहा यह विवाद समाप्त हो गया है। इस निर्णय के साथ, दिल्ली हाई कोर्ट का 2005 का फैसला बरकरार रहा, जिसमें हिंदुजा बंधुओं और एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आरोपों को खारिज किया गया था। जानें इस घोटाले के पीछे की कहानी और इसके राजनीतिक प्रभाव के बारे में।
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

नई दिल्ली। भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद 'बोफोर्स तोप सौदा घोटाले' में कानूनी प्रक्रिया का अंत हो गया है। इस मामले से संबंधित अंतिम याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है, जो लगभग चार दशकों से चल रही थी।


अदालत का निर्णय और पीठ

इस मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2005 के निर्णय के खिलाफ वकील और भाजपा नेता अजय कुमार अग्रवाल द्वारा दायर अंतिम अपील पर विचार करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब इस मामले में आगे बढ़ने का कोई कानूनी आधार नहीं बचा है।


2005 का दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय बरकरार

दिल्ली हाई कोर्ट का 2005 का निर्णय अब सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद बरकरार रहेगा, जिसमें हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आरोपों को खारिज कर दिया गया था। आपको बता दें कि 2018 में CBI ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 4,522 दिनों की अत्यधिक देरी के आधार पर खारिज कर दिया। इसके बाद अजय अग्रवाल की याचिका ही एकमात्र कानूनी विकल्प बची थी, जो अब समाप्त हो गई है।


बोफोर्स घोटाला क्या था?

24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये में 400 'FH-77' हाउवित्जर तोपों की खरीद का समझौता हुआ था। विवाद तब शुरू हुआ जब अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने आरोप लगाया कि इस सौदे को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय नेताओं, रक्षा अधिकारियों और बिचौलियों को 64 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी। इस विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा और 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। इस मामले की जांच लगभग 40 वर्षों तक चली, जिसमें सरकारी खजाने से लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन अंततः अदालत में रिश्वतखोरी के आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिल पाया।