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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026: बहुपक्षवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में बहुपक्षवाद को प्रमुखता दी गई, जिसमें सभी सदस्य देशों ने एक समावेशी और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की स्थापना का संकल्प लिया। घोषणापत्र में सुरक्षा परिषद में सुधार, आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता, और वैश्विक संस्थानों में सुधार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी। भारत, चीन, रूस और ईरान ने इस सम्मेलन से कई लाभ प्राप्त किए, जबकि अमेरिका, पाकिस्तान और इजराइल पर वैश्विक दबाव बढ़ा। इस सम्मेलन के परिणामों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई दिशा दिखाई है।
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का घोषणापत्र


नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में 2026 के लिए 45 पन्नों का 140 बिंदुओं का घोषणापत्र जारी किया गया। इस घोषणापत्र में 'बहुपक्षवाद' (Multilateralism) को प्रमुखता दी गई। सभी सदस्य देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि किसी एक देश की शक्ति या विचारधारा का वर्चस्व नहीं होना चाहिए। ब्रिक्स देशों ने व्यक्तिगत स्वार्थों को दरकिनार करते हुए एक समावेशी, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की स्थापना का संकल्प लिया।


घोषणापत्र के मुख्य बिंदु

घोषणापत्र में वैश्विक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और शांति से संबंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी:



  • सुरक्षा परिषद में सुधार: भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता देने के समर्थन की पुष्टि की गई।

  • आतंकवाद पर कड़ा संदेश: सभी प्रकार के आतंकवाद, सीमा-पार आतंकवाद की फंडिंग और आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों की निंदा की गई। विशेष रूप से, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी भर्त्सना की गई।

  • एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध: अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करके लगाए गए एकतरफा दंडात्मक प्रतिबंधों की निंदा की गई।

  • वैश्विक संस्थानों में सुधार: डब्ल्यूटीओ (WTO), विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया।

  • अंतरिक्ष और ऊर्जा सुरक्षा: बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ को रोकने और नवीकरणीय व परमाणु ऊर्जा के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।


भारत, चीन, रूस और ईरान के लाभ

भारत: भारत को आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स का मजबूत समर्थन मिला। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के दावों को मजबूती मिली और चीन के साथ संबंधों में सुधार का अवसर मिला।


चीन: चीन ने अमेरिकी व्यापारिक दबाव और एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ ब्रिक्स देशों को एकजुट किया। भारत के साथ संबंधों में सकारात्मक पहल से चीन को अपनी वैश्विक छवि को सुधारने का मौका मिला।


रूस: पश्चिमी देशों द्वारा अलग-थलग करने के प्रयासों के बावजूद, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ब्रिक्स के केंद्र में बने रहे। रूस के खिलाफ लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों पर भारत और यूएई का समर्थन मिला।


ईरान और खाड़ी देश: ईरान को इजराइल के खिलाफ कड़ा रुख और ब्रिक्स में समानता का दर्जा मिला। सऊदी अरब और यूएई ने ब्रिक्स मंच का उपयोग क्षेत्रीय तनाव प्रबंधन के लिए किया।


अमेरिका, पाकिस्तान और इजराइल पर वैश्विक दबाव

अमेरिका: अमेरिका का नाम लिए बिना, ब्रिक्स ने उसके द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों और डॉलर के वर्चस्व का विरोध किया, यह स्पष्ट करते हुए कि एकतरफा वैश्विक व्यवस्था अब स्वीकार्य नहीं है।


पाकिस्तान: सीमा-पार आतंकवाद और टेरर फंडिंग पर ब्रिक्स का सख्त रुख पाकिस्तान की चिंताओं को बढ़ा रहा है, खासकर जब भारत के आतंकवाद-विरोधी प्रस्तावों का समर्थन चीन द्वारा किया जा रहा है।


इजराइल: गाजा और लेबनान के संदर्भ में इजराइल को सीधी चेतावनी दी गई और कब्जाधारी सेना को वापस बुलाने की मांग की गई, जिससे उस पर अंतरराष्ट्रीय संयम बरतने का दबाव बढ़ गया है।