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भाजपा की सहयोगी पार्टियों की चिंता बढ़ी, 2024 चुनावों की तैयारी में बदलाव

भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टियों में इन दिनों चिंता का माहौल है, खासकर पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट-फूट के कारण। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद कई सहयोगी पार्टियों का महत्व बढ़ गया है, जिसमें टीडीपी, जनता दल यू और शिवसेना शामिल हैं। भाजपा की स्थिति में संभावित बदलाव और राज्य स्तर पर सहयोगियों की निर्भरता पर चर्चा की गई है। जानें कैसे ये घटनाएँ भाजपा की चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकती हैं।
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भाजपा की सहयोगी पार्टियों की चिंता बढ़ी, 2024 चुनावों की तैयारी में बदलाव

सहयोगी पार्टियों की चिंताएँ


भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टियों में इन दिनों चिंता का माहौल है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की हालिया जीत और तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट-फूट ने उनकी चिंताओं को और बढ़ा दिया है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा की कई सहयोगी पार्टियों का महत्व अचानक बढ़ गया है। इनमें आंध्र प्रदेश की टीडीपी, बिहार की जनता दल यू और महाराष्ट्र की शिवसेना शामिल हैं। बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी भी इस सूची में है। दिलचस्प बात यह है कि चिराग पासवान की लोजपा, जो केवल पांच सांसदों के साथ है, एनडीए की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी है। इसी तरह, एकनाथ शिंदे की शिवसेना चार सांसदों के साथ चौथी सबसे बड़ी पार्टी है। चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के पास 16 और नीतीश कुमार की जनता दल यू के 12 सांसद हैं। इन पार्टियों की ताकत के बल पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बहुमत मिला है। लेकिन अब लोकसभा और राज्यसभा की स्थिति बदल रही है।


भाजपा की स्थिति में संभावित बदलाव

यदि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर लगभग 20 सांसदों का एक समूह बनता है और स्पीकर इसे मान्यता देते हैं, तो इससे भाजपा की स्थिति मजबूत हो जाएगी। भले ही उनका विलय भाजपा में न हो, फिर भी उन्हें भाजपा के सांसदों के रूप में गिना जाएगा। इसी तरह, तमिलनाडु में कांग्रेस ने डीएमके को छोड़ने के बाद जो रुख अपनाया है, वह भी भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है। कहा जा रहा है कि दोनों पार्टियों के बीच बातचीत हुई है और डीएमके मुद्दा आधारित समर्थन देने के लिए तैयार है। यदि ऐसा होता है, तो भाजपा की पुरानी सहयोगी पार्टियों पर निर्भरता कम हो जाएगी।


राज्य स्तर पर भाजपा की स्थिति

एकनाथ शिंदे को 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जो महत्व मिला था, वह विधानसभा चुनाव में समाप्त हो गया। लोकसभा चुनाव के दौरान वे मुख्यमंत्री थे और उनकी पार्टी के सात सांसद जीते थे। लेकिन विधानसभा में भाजपा ने अकेले 132 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जिससे शिंदे की आवश्यकता नहीं रही। इसी तरह, बिहार में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा ने उन्हें हटा दिया और अपना मुख्यमंत्री बना लिया। अब नीतीश कुमार की पार्टी पूरी तरह से भाजपा पर निर्भर है।


भाजपा की भविष्य की रणनीतियाँ

इसलिए, चाहे महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे हों या बिहार में नीतीश कुमार और चिराग पासवान, सभी को एनडीए में रहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करनी होगी। जून 2024 में इन नेताओं का जो महत्व था, वह अब समाप्त हो गया है। तृणमूल के टूटने के साथ भाजपा ने लोकसभा में अपना बहुमत लगभग प्राप्त कर लिया है। इसके अलावा, तृणमूल के जो राज्यसभा सांसद इस्तीफा दे रहे हैं, वे सभी भाजपा की टिकट पर दोबारा जीतकर आएंगे। भाजपा ने पहले ही आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है। इस प्रकार, भाजपा अगले तीन से चार महीनों में राज्यसभा में 123 सांसदों तक पहुंच जाएगी, जो कि बहुमत के लिए आवश्यक है। यह एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि 1988 के बाद किसी भी पार्टी को राज्यसभा में अकेले बहुमत नहीं मिला है। हालांकि, भाजपा के जानकार नेताओं का कहना है कि सहयोगियों को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी पार्टियों पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है। लेकिन यदि उन्होंने अलग राजनीतिक प्रयास करने की कोशिश की, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं।