भारत और अमेरिका के बीच विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक पर बढ़ी बयानबाजी
नई दिल्ली में विवाद की शुरुआत
नई दिल्ली: विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक 2026 को लेकर भारत और अमेरिका के बीच बयानबाजी तेज हो गई है. अमेरिकी सांसद राइली मूर की आलोचना पर भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि संसद में बनने वाले कानून पूरी तरह देश का आंतरिक विषय हैं और इन पर बाहरी टिप्पणी उचित नहीं मानी जा सकती.
भारत का स्पष्ट जवाब
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को कहा कि भारत में कानून लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत बनाए जाते हैं और उन्हें उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका समेत कई देशों में विदेशी फंडिंग पर निगरानी रखने वाले कानून पहले से मौजूद हैं. इसलिए भारत के विधायी निर्णयों पर बाहरी प्रतिक्रिया देना उचित नहीं है. सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन केवल नियामकीय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से लाए गए हैं.
अमेरिकी सांसद राइली मूर की टिप्पणियाँ
अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया था कि प्रस्तावित संशोधन ईसाई संस्थाओं और चर्चों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. उनका दावा था कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त या रद्द हो जाता है तो सरकार उसके संसाधनों का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ सकता है और भारतीय सरकार को इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करना चाहिए.
विधेयक में प्रस्तावित संशोधन
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द, समाप्त या नवीनीकृत नहीं होता है, तो सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण अस्थायी रूप से उसके विदेशी अंशदान और उससे जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन कर सकेगा. धार्मिक स्थलों के मामलों में यह भी प्रावधान रखा गया है कि उनकी धार्मिक पहचान और स्वरूप को किसी भी स्थिति में सुरक्षित रखा जाएगा. सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य केवल संपत्तियों का विधिसम्मत प्रबंधन सुनिश्चित करना है.
सरकार का उद्देश्य और बढ़ती बहस
केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का मकसद विदेशी धन से संचालित संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करना है. साथ ही विदेशी अंशदान से बनी सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा भी इसकी प्राथमिकता है. हालांकि विपक्ष और कुछ अंतरराष्ट्रीय हलकों में इन प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. भारत ने दोहराया है कि संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़े फैसले पूरी तरह देश के आंतरिक विषय हैं.
