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भारत की ऊर्जा नीति: रूस से तेल खरीदने की चुनौती

अमेरिका के नए विधेयक ने भारत की ऊर्जा नीति को चुनौती दी है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की बात की गई है। भारत को अमेरिका के दबाव और अपनी ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। सऊदी अरब से संकट और ईरान पर प्रतिबंधों के चलते भारत की स्थिति और भी जटिल हो गई है। जानें कि भारत किस प्रकार वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी भूमिका निभा रहा है और रूस से तेल खरीदने की मजबूरी क्या है।
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अमेरिका का नया विधेयक

अमेरिका के दोनों सदनों ने एक विधेयक पारित किया है, जो रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। इस कानून के तहत, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे प्रमुख खरीदार देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार मिलेगा। अब यह ट्रंप की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह इन देशों पर टैरिफ लगाते हैं या नहीं। यह विधेयक जल्द ही राष्ट्रपति के पास जाएगा, और उनके हस्ताक्षर के बाद लागू हो जाएगा। इस विधेयक के पारित होने के बाद, भारत के सामने एक महत्वपूर्ण दुविधा उत्पन्न हो गई है: अमेरिका के दबाव में झुकना या अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना।


भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा

यदि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है, तो अमेरिका उस पर टैरिफ लगा सकता है, जैसा कि वाशिंगटन से संकेत मिल रहे हैं। दूसरी ओर, यदि भारत अमेरिकी दबाव के आगे झुकता है, तो उसकी ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि मध्य-पूर्व में संघर्ष के कारण पहले से ही सप्लाई बाधित है। भारत ने अपने ईंधन निर्यात में विविधता लाने का प्रयास किया है और वर्तमान में 40 से अधिक देशों से तेल और गैस का आयात कर रहा है।


सऊदी अरब से संकट

सऊदी अरब से झटका: भारत सऊदी तेल का एक बड़ा आयातक है, लेकिन यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण सऊदी अरब का तेल निर्यात संकट में है। इस बीच, सऊदी तेल कंपनी अरामको ने भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल की आपूर्ति रोक दी है। यदि भारत अमेरिकी दबाव में रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदता है, तो यह एक बड़ा संकट उत्पन्न कर सकता है।


रूसी तेल खरीदने की मजबूरी

भारत की तेल कंपनियों को वैकल्पिक सप्लाई और अन्य तेल उत्पादक देशों से खरीदारी करनी पड़ेगी, जिससे शिपिंग रूट पर आने वाला खर्च बढ़ सकता है। इसका बोझ अंततः जनता को उठाना पड़ेगा। भारत सरकार का तर्क है कि वह अपनी जनता के लिए रूस से किफायती ऊर्जा खरीदता है।


भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि रूस से तेल खरीदना अचानक बंद करना पड़ा, तो उसे 40 प्रतिशत कच्चे तेल की व्यवस्था किसी अन्य देश से करनी होगी। मध्य-पूर्व में संघर्ष के कारण वहां से तेल प्राप्त करना बेहद चुनौतीपूर्ण है।


ट्रंप के सामने भारत का रुख

डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, जबकि चीन पर कोई टैरिफ नहीं लगाया गया था। उस समय भारत सरकार की प्रतिक्रिया अधिक संयमित थी। लेकिन अब, विधेयक के पारित होने के बाद, विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका के नए टैरिफ से द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान हो सकता है। भारत ने कहा है कि वह अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।


वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका

भारत का रूसी तेल खरीदना केवल उसकी जनता के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखने में भी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी थी। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और कई देशों को रिफाइन तेल का निर्यात करता है।


ईरान से तेल खरीदने की स्थिति

ईरान पहले ही छूट चुका: भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता था, लेकिन 2019 में अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए। अब सवाल यह है कि अमेरिका के दबाव में भारत किस-किस से तेल खरीदना बंद करेगा।


भारत का तेल आयात

केप्लर की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में भारत का रूस से तेल आयात गिरा है। सितंबर में भारत ने रूस से लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया, जबकि अगस्त में यह 21 लाख बैरल प्रतिदिन था।