भारत की कृषि को आधुनिक और प्राकृतिक खेती के संतुलन से सशक्त बनाना आवश्यक: डॉ. बीएस ढिल्लों
कृषि क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता
भागलपुर: पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित और पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर डॉ. बीएस ढिल्लों ने कहा है कि भारत को प्राकृतिक-ऑर्गेनिक खेती, उच्च गुणवत्ता वाली उपज और आधुनिक कृषि तकनीकों के संतुलित उपयोग के माध्यम से कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि देश की कृषि प्रणाली को टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीकी नवाचार की आवश्यकता है।
डॉ. ढिल्लों ने भागलपुर में एक मीडिया चैनल से बातचीत के दौरान कहा कि यह उनका बिहार का पहला दौरा नहीं है, बल्कि वे पहले भी कई बार राज्य का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने बिहार और पंजाब के बीच अपने गहरे संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कृषि और मिट्टी के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भारतीय कृषि परंपरा केवल भूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और वैज्ञानिक धरोहर है।
उन्होंने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय उनके लिए मंदिर के समान हैं, जहां कृषि वैज्ञानिक निरंतर शोध और नई तकनीकों पर कार्य कर रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि करना और खेती को अधिक लाभकारी बनाना है।
डॉ. ढिल्लों ने बताया कि पंजाब और बिहार जैसे राज्यों में कृषि की संभावनाएं बहुत अधिक हैं। यदि किसानों को सही तकनीक, प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो उत्पादन में बड़ा सुधार संभव है। उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों को विशेष सहायता की आवश्यकता है, क्योंकि उनके पास संसाधन सीमित होते हैं।
उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पंजाब में प्रति हेक्टेयर लगभग 120 क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है, जबकि प्राकृतिक खेती में उत्पादन थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन लागत काफी कम होती है। उन्होंने किसानों को लाभ और बचत दोनों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि खेती में पानी की कमी एक गंभीर समस्या है, विशेषकर पंजाब जैसे राज्यों में। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार, विश्वविद्यालय और किसानों को मिलकर काम करना होगा। नीति निर्माण में कृषि की वास्तविक चुनौतियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
डॉ. ढिल्लों ने आधुनिक तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), बायोटेक्नोलॉजी और नैनो टेक्नोलॉजी का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका उपयोग कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। हालांकि, इसके लिए पर्याप्त निवेश और संसाधनों की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि भारत अपने संसाधनों के आधार पर धीरे-धीरे कृषि क्षेत्र में प्रगति कर रहा है। सरकार शिक्षा और शोध संस्थानों को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है और समय के साथ कृषि विश्वविद्यालयों के बजट और संसाधनों में वृद्धि हुई है।
डॉ. ढिल्लों ने निष्कर्ष निकाला कि यदि वैज्ञानिक शोध, आधुनिक तकनीक और किसानों का सहयोग इसी तरह आगे बढ़ता रहा, तो भारत का कृषि क्षेत्र न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी मजबूत स्थिति हासिल करेगा।
