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भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता की मांग को लेकर एक मजबूत अभियान चलाया है। 1994 से इस दिशा में प्रयासरत, भारत का तर्क है कि वैश्विक संतुलन बदल चुका है और विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारत ने शांति अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और P5 देशों में से कई इसका समर्थन कर रहे हैं। जानें भारत की इस मांग के पीछे के तर्क और वैश्विक समर्थन की स्थिति के बारे में।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का इतिहास

द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थापना की गई थी। इस परिषद के गठन को अब 80 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, लेकिन इसके स्थायी सदस्यों की संरचना में कोई बदलाव नहीं आया है। इस शक्तिशाली निकाय में चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे पांच देश स्थायी सदस्य (P5) के रूप में शामिल हैं, जिनके पास वीटो शक्ति है। भारत लंबे समय से इस व्यवस्था में बदलाव और विस्तार की मांग कर रहा है, जो वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप है।


भारत की स्थायी सदस्यता की मांग

भारत ने पहली बार 1994 में संयुक्त राष्ट्र की 49वीं महासभा में UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए अपना दावा प्रस्तुत किया था। तब से, भारत ने हर मंच पर इस मांग को दोहराया है। सितंबर 2000 में न्यू यॉर्क के 'UN मिलेनियम समिट' में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी भारत के पक्ष को मजबूती से रखा। भारत का तर्क है कि विकासशील देशों, विशेषकर एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका को सुरक्षा परिषद में उचित प्रतिनिधित्व मिलना आवश्यक है।


स्थायी और अस्थायी सदस्यता का विस्तार

नई दिल्ली का मानना है कि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से सुरक्षा परिषद की निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार नहीं होगा। 1965 में एकमात्र बार सदस्यों की संख्या को 11 से बढ़ाकर 15 किया गया था, जिसमें चार नई अस्थायी सीटें जोड़ी गई थीं। भारत का कहना है कि 1945 का वैश्विक संतुलन अब बदल चुका है, और इसकी विशाल जनसंख्या, मजबूत लोकतंत्र, बढ़ती अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक महत्व के कारण स्थायी सदस्यता का पूरा हकदार है।


भारत का योगदान शांति अभियानों में

भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए अपनी गैर-स्थायी सदस्यता का अभियान आधिकारिक रूप से शुरू किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि भारत ने यूएन के लगभग 50 शांति अभियानों में करीब 3,00,000 सैनिकों का योगदान दिया है। वर्तमान में भी हजारों भारतीय सैनिक विभिन्न शांति अभियानों में तैनात हैं। भारत हमेशा संवाद, कूटनीति और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की आवाज उठाने में अग्रणी रहा है।


भारत का अस्थायी सदस्य के रूप में सफर

भारत अब तक 8 बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है। भारत ने पहली बार 1950-51 में इसका सदस्य बनने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और हाल ही में 2021-22 में भी यह जिम्मेदारी निभाई है। इन कार्यकालों के दौरान भारत ने अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, प्रतिबंधों और विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए 'शांति' (Norms, Trust, Integrity) थीम के तहत अपना चुनाव अभियान शुरू किया है।


स्थायी और अस्थायी सदस्यता के बीच का अंतर

सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों को एक वोट देने का अधिकार होता है, लेकिन 5 स्थायी सदस्यों (P5) के पास 'वीटो पावर' होती है। इसका अर्थ है कि यदि कोई स्थायी सदस्य किसी प्रस्ताव के खिलाफ वोट करता है, तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता, भले ही अन्य सभी देश उसके समर्थन में हों। यदि भारत को स्थायी सीट मिलती है, तो उसे भी यह वीटो अधिकार प्राप्त होगा, जिससे वैश्विक मामलों और निर्णयों में भारत की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।


वैश्विक समर्थन और चीन की स्थिति

भारत के स्थायी सीट के दावे को विश्व स्तर पर व्यापक समर्थन प्राप्त है। P5 देशों में से चार देश- अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस- भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन करते रहे हैं। हालांकि, चीन ने इस पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है। इसके अलावा, कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों, ब्रिक्स (BRICS) संगठन के सदस्य देशों और अन्य विकासशील देशों ने भी माना है कि सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन में भारत सबसे मजबूत और स्वाभाविक दावेदार है।