भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का इतिहास
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई थी। आज 81 वर्ष बीत जाने के बाद भी इसके पांच स्थायी सदस्यों में कोई परिवर्तन नहीं आया है। ये स्थायी सदस्य हैं: चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका, और इन सभी के पास वीटो शक्ति है। इस बीच, भारत लंबे समय से UNSC में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है।
भारत की स्थायी सदस्यता की मांग के तर्क
भारत का कहना है कि 1945 के बाद से वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में काफी बदलाव आया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को वैश्विक निर्णयों में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारत ने 1994 से स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया है।
भारत की स्थायी सीट की आवश्यकता
भारत का मानना है कि UNSC का वर्तमान ढांचा आज की वास्तविकताओं को सही तरीके से नहीं दर्शाता। भारत ने स्थायी और गैर-स्थायी दोनों प्रकार की सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग की है। उनका तर्क है कि केवल गैर-स्थायी सीटों की संख्या बढ़ाने से निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आएगा, क्योंकि वीटो का अधिकार अभी भी पांच स्थायी सदस्यों के पास रहेगा।
भारत की दावेदारी के आधार
भारत अपनी स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिए कई कारण प्रस्तुत करता है, जैसे कि इसकी बड़ी जनसंख्या, लोकतांत्रिक प्रणाली, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक स्तर पर बढ़ती भूमिका, और संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भारत का योगदान।
भारत का UNSC में इतिहास
भारत अब तक आठ बार UNSC का गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है। इसकी पहली सदस्यता 1950-51 में थी, इसके बाद 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और 2021-22 में भी भारत को चुना गया।
UNSC की संरचना
UNSC में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें पांच स्थायी और 10 गैर-स्थायी सदस्य शामिल होते हैं। गैर-स्थायी सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है। वर्तमान में, 2026 में डेनमार्क, ग्रीस, पाकिस्तान, पनामा और सोमालिया का कार्यकाल चल रहा है, जबकि बहरीन, कोलंबिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, लातविया और लाइबेरिया 2027 तक सदस्य बने रहेंगे।
स्थायी सदस्यता के लाभ
यदि भारत UNSC का स्थायी सदस्य बनता है, तो उसे परिषद में स्थायी स्थान मिलेगा और वीटो शक्ति का अधिकार भी प्राप्त होगा। UNSC में महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए आवश्यक है कि किसी स्थायी सदस्य का विरोध न हो, जिसका अर्थ है कि किसी प्रस्ताव के खिलाफ स्थायी सदस्य का वीटो उसे रोक सकता है।
UNSC में सुधार की चुनौतियाँ
हालांकि, UNSC में सुधार का रास्ता आसान नहीं है। परिषद के विस्तार, सीटों की संख्या और नए स्थायी सदस्यों के मॉडल पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में अभी तक व्यापक सहमति नहीं बन पाई है। इसलिए, भारत के लिए यह चुनौती है कि वह अपनी दावेदारी के साथ-साथ सुधार पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने में भी सफल हो।
