भारत की सबसे लंबी भूख हड़तालें: सोनम वांगचुक से लेकर पोट्टी श्रीरामुलु तक
भारत की भूख हड़तालों का इतिहास
हाल ही में, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर 20 दिनों तक भूख हड़ताल की। उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस ने उन्हें जबरन एंबुलेंस में बिठाकर सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया। इस घटना ने भूख हड़तालों के इतिहास पर चर्चा को फिर से जीवित कर दिया है। स्वतंत्र भारत में कई ऐसे आंदोलन हुए हैं, जहां नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर लंबे समय तक अनशन किया, जिनका देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा।
पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन (1952)
भारत की सबसे बड़ी भूख हड़ताल का श्रेय पोट्टी श्रीरामुलु को जाता है, जिन्होंने 1952 में तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन किया। उन्होंने 58 दिनों तक उपवास किया और 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मौत के बाद देशभर में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार ने अलग आंध्र राज्य का गठन किया।
इरोम शर्मिला का 16 साल का अनशन
मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 2000 में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) हटाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। उनका अनशन लगभग 16 वर्षों तक चला, जो दुनिया के सबसे लंबे अहिंसक आंदोलनों में से एक माना जाता है। इस दौरान उन्हें कई बार हिरासत में लिया गया और डॉक्टर्स की निगरानी में रखा गया। 2016 में उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया।
अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन
2011 में, समाजसेवी अन्ना हजारे ने जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में भूख हड़ताल की। उनका 13 दिन का अनशन देशव्यापी जन आंदोलन में बदल गया, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू किया। इस आंदोलन ने केंद्र सरकार पर दबाव डाला और लोकपाल कानून पर व्यापक बहस को जन्म दिया।
के. चंद्रशेखर राव का अनशन
तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव ने 2009 में अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन किया। उनका अनशन लगभग 11 दिनों तक चला और इसने तेलंगाना की मांग को राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुखता दी। अंततः 2014 में तेलंगाना भारत का 29वां राज्य बना।
जीडी अग्रवाल का 111 दिन का अनशन
पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल ने गंगा नदी के संरक्षण के लिए 22 जून 2018 को आमरण अनशन शुरू किया। उनका अनशन 111 दिनों तक चला, जिसके बाद 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया। यह आंदोलन भारत के सबसे लंबे और चर्चित पर्यावरण आंदोलनों में से एक माना जाता है।
