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भारत के लोकतंत्र में मतदाता सूची का संकट: मोदी-शाह का राज

इस लेख में भारत के लोकतंत्र में मतदाता सूची के संकट का विश्लेषण किया गया है। मोदी और शाह की नीतियों ने कैसे लोकतंत्र को प्रभावित किया है, यह जानने के लिए पढ़ें। क्या नागरिकों के अधिकार सुरक्षित हैं? जानें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर।
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लोकतंत्र और मतदाता सूची का संकट


क्या रामजी को भी याद करना चाहिए? आखिरकार, मोदी और शाह ने रामजी के मंदिर को भी चोरों का अड्डा बना दिया है। शायद रामजी सोचते होंगे कि इन दोनों के अहंकार और भूख के लिए उन्हें क्या अवतार लेना चाहिए। इनकी गतिविधियों ने लोकतंत्र, संसद, और न्यायपालिका को तहस-नहस कर दिया है। पिछले दस महीनों में, आम नागरिकों के वोटों को भी खा जाने का काम किया जा रहा है। ऐसा तो रावण के राज में भी नहीं हुआ था।


लोकतंत्र का अर्थ क्या है? यदि नागरिक को यह भी नहीं पता कि वह मतदाता है या नहीं, तो यह व्यवस्था कैसी है? मोदी-शाह ने अंधभक्तों की एक फौज बना दी है, जो मानती है कि रावण की तरह शासन करना ही हिंदू राष्ट्र की राजनीति है।


जून 2025 से, तीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मतदाता सूची से तेरह करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। यह अभियान मृत, स्थानांतरित, और डुप्लीकेट नामों को हटाने के लिए शुरू हुआ था, लेकिन इसके पीछे की प्रक्रिया क्या थी? भारत का चुनाव आयोग इस प्रक्रिया का कर्ता है।


नए मतदाता के Form 6 में बदलाव बिना नियमों के नहीं किया जा सकता। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन फिर भी इसे लागू किया गया। यह दर्शाता है कि चुनाव आयोग में मनमानी हो रही है।


मोदी-शाह के इस डिजिटल इंडिया में, चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची स्थानीय स्तर पर बनती है, लेकिन दोनों चुनाव आयुक्तों ने इसके केंद्रीकरण पर आपत्ति की है।


नतीजतन, आज भारत के एक अरब मतदाताओं के मालिक नरेंद्र मोदी और अमित शाह हैं।