भारत ने अमेरिका-ईरान तनाव के बीच डीजल और जेट ईंधन निर्यात पर टैक्स बढ़ाया
नई दिल्ली में आर्थिक बदलाव
नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और नाकेबंदी का प्रभाव अब भारतीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी वृद्धि को देखते हुए, भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने देश से बाहर भेजे जाने वाले डीजल और जेट ईंधन (एविएशन टरबाइन फ्यूल) के निर्यात पर लगने वाले अप्रत्याशित लाभ कर (विंडफॉल टैक्स) में भारी बढ़ोतरी की है। यह नई दरें आज, यानी 16 जुलाई 2026 से लागू हो गई हैं।
निर्यात टैक्स में बदलाव
वित्त मंत्रालय के अनुसार, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच घरेलू कंपनियों के अप्रत्याशित मुनाफे को नियंत्रित करने के लिए टैक्स दरों में संशोधन किया गया है। डीजल के निर्यात पर टैक्स को ₹8.5 प्रति लीटर से बढ़ाकर ₹15.5 प्रति लीटर कर दिया गया है। वहीं, हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन (ATF) पर निर्यात टैक्स को ₹7.5 प्रति लीटर से बढ़ाकर ₹14.5 प्रति लीटर कर दिया गया है। पेट्रोल के निर्यात पर टैक्स को ₹4 प्रति लीटर से घटाकर ₹2.5 प्रति लीटर किया गया है।
इस फैसले का कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण ओमान की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ हारमुज जैसे प्रमुख समुद्री तेल मार्गों पर संकट बढ़ गया है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। जब वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं, तो निजी कंपनियां भारतीय बाजार के बजाय विदेशों में ईंधन बेचना अधिक लाभकारी समझती हैं। सरकार ने इस टैक्स के माध्यम से निर्यात को कम करने का प्रयास किया है ताकि देश में ईंधन की कोई कमी न हो।
आम जनता पर प्रभाव
सरकार के इस निर्णय का आम जनता की जेब पर सीधा असर नहीं पड़ेगा। देश में पेट्रोल पंपों पर मिलने वाले पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। डीजल की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित होने से माल ढुलाई और परिवहन की लागत नियंत्रण में रहेगी, जिससे आवश्यक वस्तुओं के दाम नहीं बढ़ेंगे।
हवाई यात्रा की लागत में वृद्धि
हालांकि देश में ATF की कोई कमी नहीं होगी, लेकिन वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव में आने वाले दिनों में विमानन कंपनियां हवाई टिकटों की कीमतें बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा, सरकार हर 15 दिन में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों की समीक्षा करती है, जिसके आधार पर इन टैक्स दरों को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। यदि खाड़ी देशों का तनाव कम नहीं होता है, तो ऊर्जा क्षेत्र में और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
