Newzfatafatlogo

भारत में अल नीनो की वापसी: मानसून पर संभावित प्रभाव

इस वर्ष भारत में मानसून के दौरान अल नीनो की वापसी से चिंताएं बढ़ गई हैं। जापान की मौसम एजेंसी ने इसकी पुष्टि की है, जिससे वर्षा, गर्मी और कृषि पर संभावित प्रभाव की आशंका जताई जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक अन्य मौसमीय पैटर्न भारत को इस स्थिति से बचा सकता है। जानें अल नीनो का भारत पर क्या असर हो सकता है और किसानों के लिए यह संकट कैसे बन सकता है।
 | 
भारत में अल नीनो की वापसी: मानसून पर संभावित प्रभाव

अल नीनो की वापसी से बढ़ी चिंताएं

इस वर्ष भारत में मानसून के दौरान अल नीनो के लौटने से नई चिंताएं उत्पन्न हुई हैं। जापान की मौसम एजेंसी ने आधिकारिक रूप से अल नीनो के आगमन की पुष्टि की है, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि यह देशभर में वर्षा को प्रभावित कर सकता है, गर्मी को बढ़ा सकता है और कृषि पर दबाव डाल सकता है। मानसून की कमजोरी को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि एक अन्य मौसमीय पैटर्न भारत को इस स्थिति से बचाने में सहायक हो सकता है।


मौसम के आकलन

हालिया मौसम संबंधी आकलनों के अनुसार, जून से सितंबर तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान मजबूत अल नीनो की स्थितियों के बनने की संभावना है। इसके साथ ही भारतीय महासागर के न्यूट्रल बने रहने का अनुमान है, जिससे मानसून की कमजोरी की संभावना कम हो जाती है।


अल नीनो का विकास

11 जून को जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने बताया कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थितियां विकसित हो चुकी हैं और यह उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों तक बनी रह सकती हैं। भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून पहले ही कुछ क्षेत्रों में देरी से पहुंचा है और इसकी प्रगति भी असमान है। इस स्थिति को लेकर भारत में चिंता बढ़ रही है।


खतरे की घंटी नहीं

हालांकि, मौसम वैज्ञानिक फिलहाल किसी गंभीर खतरे की चेतावनी नहीं दे रहे हैं। इसका कारण जुलाई के आसपास पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के संभावित उभार को माना जा रहा है। यह पहले भी अल नीनो के सूखे प्रभाव को कम करने और मानसून के दूसरे हिस्से में वर्षा बढ़ाने में सहायक रहा है।


अल नीनो का प्रभाव

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है, जो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म तापमान से पहचाना जाता है। यह भारत से हजारों किलोमीटर दूर उत्पन्न होता है, लेकिन इसका प्रभाव पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में महसूस किया जा सकता है। अल नीनो का सीधा प्रभाव यह है कि यह दक्षिण-पश्चिम मानसून को चलाने वाली नमी से भरी हवाओं को कमजोर कर देता है, जिससे सामान्य से कम वर्षा, लंबे सूखे और अधिक तापमान का खतरा बढ़ जाता है।


कृषि पर प्रभाव

पिछले वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, अल नीनो वाले वर्षों में भारत में कमजोर मानसून देखा गया है, जिसका प्रभाव कृषि उत्पादन, पानी और खाद्य कीमतों पर पड़ा है। किसानों को इसका नकारात्मक प्रभाव सहन करना पड़ता है, जिससे उत्पादन में कमी आती है। इस संदर्भ में भारत में चिंताएं बढ़ रही हैं।


वैश्विक संकट

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) पहले ही चेतावनी दे चुका है कि 2026 के मध्य से अल नीनो उभर सकता है, जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। इसे वैश्विक संकट के रूप में देखा जा रहा है, जिसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान केंद्र पहले ही मॉनसून के औसत से कम रहने की संभावना व्यक्त कर चुका है। भारत में किसान खेती के लिए मॉनसून पर निर्भर हैं, ऐसे में यदि अल नीनो का प्रभाव अधिक हुआ, तो किसानों के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है।