भारत में इस्लाम और हिंदू धर्म: भय और आत्मविश्वास का विश्लेषण
इस्लाम और हिंदू धर्म के बीच का तनाव
लंदन की प्रतिष्ठित पत्रिका 'द इकॉनोमिस्ट' की इस सप्ताह की कवर स्टोरी ने यूरोप में इस्लाम के बारे में गहन चर्चा की है। शीर्षक 'The Truth and the Lies About Islam in Europe' ने हिंदू बनाम इस्लाम के संदर्भ में विचार करने का अवसर प्रदान किया। यूरोप में मुसलमानों की उपस्थिति हाल की एक-डेढ़ सदी की है, जबकि भारत में वे सदियों से इस भूमि का हिस्सा हैं। इसके बावजूद, दोनों स्थानों पर राजनीतिक और सांस्कृतिक भय की भावना समान है।
ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों के मूल निवासियों की तुलना में, भारत का सोशल मीडिया और हिंदू समुदाय इस बात को लेकर अधिक चिंतित हैं कि कब यूरोप इस्लामी राष्ट्र बन जाएगा। यूरोप में मुसलमानों की संख्या छह से दस प्रतिशत है, जबकि भारत में यह संख्या चौदह से बीस प्रतिशत है। इस संदर्भ में, क्या हिंदू समुदाय में आत्मविश्वास की कमी है?
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति के बावजूद, क्या हिंदू अधिक आत्मविश्वासी हुए हैं या फिर अधिक भयभीत? यह विचारणीय है।
हिंदू धर्म, जो हजारों वर्षों से विभिन्न आक्रमणों और बदलावों का सामना कर चुका है, क्या आज भी अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित है? क्या मुसलमानों की संख्या वास्तव में एक खतरा है?
1951 में भारत में हिंदू 84.1 प्रतिशत थे, जबकि मुसलमान 9.8 प्रतिशत। 2011 की जनगणना में यह आंकड़ा बदलकर हिंदू 79.8 प्रतिशत और मुसलमान 14.2 प्रतिशत हो गया। हालांकि, यह बदलाव 'जनसंख्या विस्फोट' की कहानी का प्रमाण नहीं है। मुस्लिम प्रजनन दर में कमी आई है और हिंदू-मुस्लिम प्रजनन अंतर भी घट रहा है।
इसलिए, असली चिंता किसकी है?
पत्रिका ने यह स्पष्ट किया है कि इस्लाम और इस्लामिज़्म को एक समान समझना गलत है। मुसलमान समस्या नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक इस्लाम और कट्टरता एक समस्या हो सकती है।
भारत में भी मौलानाओं की उपस्थिति और कट्टरता की बातें हैं। लेकिन क्या यह चौदह-पंद्रह प्रतिशत मुसलमानों को अस्सी प्रतिशत हिंदुओं के अस्तित्व के लिए खतरा बना देता है?
यह एक बड़ी मूर्खता है।
इस प्रकार, हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के बीच एक चक्र है, जो लगातार चलता रहता है।
सोशल मीडिया ने इस स्थिति को और भी जटिल बना दिया है। अब अफवाहें तेजी से फैलती हैं और एक-दूसरे के प्रति डर बढ़ता है।
इसलिए, सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम कट्टरता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इतिहास की स्मृति वर्तमान का स्थायी भय बन सकती है?
हिंदू सभ्यता को हजार वर्षों का विदेशी शासन नहीं मिटा सका, तो क्या चौदह-पंद्रह प्रतिशत मुसलमान ऐसा कर सकते हैं?
यह सवाल हिंदुत्व की राजनीति से पहले हिंदू को खुद से पूछना चाहिए।
आधुनिक काल में, हमें सनातन होने का असली अर्थ समझना चाहिए। यदि हिंदू इस भय में जीते हैं कि मुसलमान उन्हें मिटा देंगे, तो यह समस्या केवल मुसलमानों की ताकत नहीं है, बल्कि हिंदू के आत्मविश्वास की भी है।
मुसलमानों को भी यह समझना होगा कि हिंदू का हर भय झूठ या षड्यंत्र कहने से खत्म नहीं होगा।
इसलिए, 'द इकॉनोमिस्ट' का विश्लेषण भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत को यह पूछना चाहिए कि जिस सनातन को इतिहास नहीं मिटा सका, उसे वर्तमान से इतना डर क्यों है?
