भारत में दालों की आत्मनिर्भरता: आंकड़े और वास्तविकता
दालों में आत्मनिर्भरता मिशन का एक साल
भारत सरकार ने 2025 में दालों में आत्मनिर्भरता के लिए एक मिशन की शुरुआत की थी। इस मिशन के पहले वर्ष के समापन पर, सरकार ने दाल उत्पादन और प्रति हेक्टेयर पैदावार के आंकड़े साझा किए हैं। अधिकारियों का दावा है कि दालों के आयात पर खर्च में एक वर्ष में लगभग 31.5% की कमी आई है। इस आंकड़े के अनुसार, देश ने आयात बिल में लगभग 14 हजार करोड़ रुपये की बचत की है। यह बचत आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है, लेकिन आयात बिल में कमी और विदेशों से दालों की वास्तविक आवश्यकता में अंतर है।
आंकड़ों के पीछे की सच्चाई
कई बार केवल आंकड़ों के आधार पर यह मान लिया जाता है कि घरेलू उत्पादन में वृद्धि के कारण विदेशों पर निर्भरता कम हो रही है। इस गिरावट के पीछे कई कारक काम कर सकते हैं, जैसे कि आयात की मात्रा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें, किस्मों के अनुसार मांग, और डॉलर-रुपये की विनिमय दर। दलहन व्यापारियों ने सरकार के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आत्मनिर्भरता की बात करना अभी जल्दबाजी है।
गिरावट के कारण
दालों के आयात बिल में आई 31.5% की कमी के पीछे दो मुख्य कारण हो सकते हैं। पहला, भारत ने विदेशों से दालों की वास्तविक मात्रा कम खरीदी हो। दूसरा, वैश्विक बाजार में दालों की कीमतें कम हुई हों। वाणिज्य मंत्रालय और DGCI&S के आंकड़ों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि आयात बिल में कमी केवल घरेलू मांग में कमी के कारण नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के गिरने और वैश्विक आपूर्ति में सुधार के कारण भी हुई है।
दालों की विविधता
दालों के आंकड़े अक्सर वास्तविक निर्भरता को छिपा देते हैं। हर दाल का बाजार और खपत का पैटर्न अलग होता है। म्यांमार और अफ्रीकी देशों से आने वाली अरहर के आयात मूल्य में बदलाव मुख्य रूप से घरेलू उपज के चक्र पर निर्भर करता है। यदि घरेलू फसल में सुधार हुआ है, तो आयात की मात्रा में कमी आई है।
विनिमय दर का प्रभाव
दालों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है। इस दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में बदलाव ने आयात बिल को प्रभावित किया। यदि रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ, तो प्रति टन आयात महंगा पड़ा। फिर भी, यदि कुल आयात बिल 46,427.60 करोड़ से घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये पर आया है, तो यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर दालों की कीमतों में इतनी गिरावट आई कि उसने कमजोर रुपये के प्रभाव को भी कम कर दिया।
क्या भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर है?
आयात बिल में कमी के बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत दालों के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है। भारत आज भी अरहर और उड़द की आपूर्ति के लिए म्यांमार और अफ्रीकी देशों पर निर्भर है। मसूर के लिए कनाडा और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भरता बनी हुई है। चना उत्पादन में भारत मजबूत स्थिति में है, लेकिन सभी दालों की जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी मंडियों से आयात एक आवश्यक मजबूरी बनी हुई है।
भविष्य की चुनौतियाँ
14,634 करोड़ रुपये की बचत देश के राजकोषीय घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए राहत की बात है। हालांकि, आंकड़े यह भी चेतावनी देते हैं कि यह राहत वैश्विक बाजार की अनुकूल परिस्थितियों के कारण है। खाद्य सुरक्षा के लिए केवल आयात बिल में कमी पर निर्भर रहने के बजाय, देश के भीतर दालों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर प्रभावी तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
