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भारत में धूम्रपान की समस्या: न्यूजीलैंड के मॉडल से सीखने की आवश्यकता

भारत में धूम्रपान की समस्या गंभीर होती जा रही है, जहां 13.5 करोड़ लोग तंबाकू के आदी हैं। बिना चिकित्सा सहायता के सिगरेट छोड़ने की सफलता दर बेहद कम है। हाल ही में एक अध्ययन में न्यूजीलैंड के तंबाकू नियंत्रण उपायों की सफलता का उल्लेख किया गया है, जिसने धूम्रपान की दर में उल्लेखनीय कमी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भी इस मॉडल से सीखकर अपनी रणनीतियों में बदलाव करना चाहिए। जानें कैसे न्यूजीलैंड ने नियंत्रित निकोटीन विकल्पों के माध्यम से धूम्रपान की दर को कम किया।
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धूम्रपान की गंभीरता

नई दिल्ली: भारत में लगभग 13.5 करोड़ लोग धूम्रपान के आदी हैं, और हर साल लाखों लोग तंबाकू से संबंधित गंभीर बीमारियों का शिकार होते हैं। चिंता की बात यह है कि बिना चिकित्सा सहायता के सिगरेट छोड़ने की सफलता दर 4 प्रतिशत से भी कम है। इस गंभीर स्थिति के बीच, 'द लैंसेट रीजनल हेल्थ वेस्टर्न पैसिफिक' में प्रकाशित एक नई रिसर्च भारत के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है। इस अध्ययन में यह बताया गया है कि न्यूजीलैंड ने पारंपरिक तंबाकू नियंत्रण उपायों के साथ-साथ नियंत्रित निकोटीन विकल्पों को अपनाकर अपने देश में धूम्रपान की दर में उल्लेखनीय कमी की है।


न्यूजीलैंड का सफल मॉडल

न्यूजीलैंड ने कैसे किया यह कमाल?

20वीं सदी के मध्य में न्यूजीलैंड में 40 प्रतिशत पुरुष और लगभग एक-तिहाई महिलाएं धूम्रपान करती थीं। कई वर्षों तक टैक्स बढ़ाने, ग्राफिक चेतावनी और साधारण पैकेजिंग जैसी सख्त नीतियों के माध्यम से 2015-16 तक यह आंकड़ा 15 प्रतिशत पर आ गया। लेकिन असली बदलाव तब आया जब 2018-19 में नियंत्रित निकोटीन विकल्पों को धूम्रपान छोड़ने के सहायक साधन के रूप में अपनाया गया। इसके परिणाम इतने प्रभावशाली रहे कि 2022-23 तक धूम्रपान करने वालों की दर 7 प्रतिशत से भी कम हो गई। रिसर्च के 'जॉइनपॉइंट रिग्रेशन एनालिसिस' से पता चलता है कि निकोटीन विकल्पों के बाद सिगरेट छोड़ने की दर 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.9 प्रतिशत हो गई, जो पहले की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक है। इसके साथ ही, युवाओं को नशे से बचाने के लिए 18 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा, फ्लेवर पर रोक और डिस्पोजेबल वेप्स पर बैन जैसे सख्त नियम भी लागू किए गए, जिससे किशोरों में यह लत रिकॉर्ड स्तर तक घट गई।


भारत को नई रणनीति की आवश्यकता

भारत को अपनी रणनीति में करना होगा बदलाव

भारतीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि देश को अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। आकाश हेल्थकेयर के इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ तोमर के अनुसार, फेफड़ों का कैंसर, सीओपीडी और दिल की बीमारियों का मुख्य कारण निकोटीन नहीं, बल्कि तंबाकू के जलने से निकलने वाले 7,000 से अधिक जहरीले रसायन होते हैं। भारत में नीतियां बनाते समय इस वैज्ञानिक तथ्य को समझना बेहद जरूरी है। वहीं, पैसिफिक वन हेल्थ हॉस्पिटल के कंसल्टेंट डॉ. सतीश कुमार श्री का कहना है कि दोनों देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं भले अलग हों, लेकिन तंबाकू की लत की चुनौती एक समान है। लंबे समय से धूम्रपान कर रहे लोगों के लिए केवल पारंपरिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। न्यूजीलैंड का मॉडल यह दर्शाता है कि यदि सख्त नियमों के साथ कम हानिकारक निकोटीन विकल्पों को रणनीति में शामिल किया जाए, तो शानदार परिणाम मिल सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी (NRT) को अपनी अनिवार्य दवाओं की सूची में शामिल कर चुका है। अब समय आ गया है कि भारत भी तंबाकू नियंत्रण की रणनीतियों को मजबूत करते हुए वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित सुविधाओं का विस्तार करे।