भारत में पारे वाले उपकरणों को हटाने की योजना: स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा
भारत का पारा हटाने का अभियान
भारत सरकार अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों से पारे (Mercury) आधारित थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने वाली मशीनों को हटाने की प्रक्रिया को तेज कर रही है। इस कार्य के लिए 2030 तक का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सरकार अब इन उपकरणों के स्थान पर सुरक्षित विकल्प स्थापित करने और पुराने उपकरणों में मौजूद जहरीले पारे को सुरक्षित तरीके से निपटाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पारा स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक माना जाता है, जिसके कारण इसे हटाने का प्रयास कई वर्षों से जारी है।
यह प्रक्रिया केवल पारे वाले उपकरणों के प्रतिस्थापन तक सीमित नहीं है। पुराने उपकरणों से निकलने वाले पारे के कचरे का सही तरीके से प्रबंधन करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखना भी आवश्यक है। - डॉ. गीता आनंदन, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) में स्वास्थ्य सेवाओं की अतिरिक्त महानिदेशक।
इस संदर्भ में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और अन्य संगठनों के अधिकारियों ने 28 से 30 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली में एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में अब तक की प्रगति की समीक्षा की गई और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की गई।
पारा: एक खतरनाक धातु
पारा है क्या, मेडिकल में कहां होता है इस्तेमाल?
पारा (Mercury) एक ऐसी धातु है, जो सामान्य तापमान पर तरल अवस्था में रहती है और इसका रंग चांदी जैसा होता है। पुराने थर्मामीटर में पारा एक पतली कांच की नली में भरा होता था, जो तापमान बढ़ने पर ऊपर की ओर चढ़ता था, जिससे बुखार का पता लगाया जाता था। इसके अलावा, मेडिकल क्षेत्र में पारे का उपयोग कई अन्य जगहों पर भी किया जाता था।
पुरानी पारे वाली मशीनों का उपयोग ब्लड प्रेशर मापने के लिए किया जाता था, जहां पारे के स्तर को देखकर रीडिंग ली जाती थी। इसके अतिरिक्त, दांतों के इलाज में भी पारे का उपयोग किया जाता था, जैसे कि डेंटल अमलगम बनाने में।
पारे के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभाव
पारे से सेहत और पर्यावरण को क्या नुकसान?
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान पारे के संपर्क में आने से गर्भ में पल रहे बच्चे को गंभीर नुकसान हो सकता है। यह बच्चे के विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। पारा बच्चों के दिमाग और नसों के विकास को प्रभावित कर सकता है, जिससे नवजात शिशुओं में जन्मजात समस्याएं हो सकती हैं।
पारे की भाप न तो रंगीन होती है और न ही इसकी कोई गंध होती है। यदि यह सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाए, तो यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न कर सकती है। पारा एक जहरीला पदार्थ है, जो दिमाग और नसों को नुकसान पहुंचा सकता है और पर्यावरण में लंबे समय तक बना रह सकता है।
सरकार की तैयारी और योजनाएं
सरकार की क्या है तैयारी?
राज्यों से चुने गए 30 अधिकारियों को ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया गया है, जिसमें उन्हें पारे से होने वाले नुकसान से बचने और पारे के कचरे को सुरक्षित तरीके से प्रबंधित करने के बारे में जानकारी दी गई। इसके तहत पारे के कचरे को अलग रखने, सुरक्षित तरीके से इकट्ठा करने और अंततः सुरक्षित तरीके से निपटाने की व्यवस्था की जाएगी। इसे 2027 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने इस कार्य के लिए एक राष्ट्रीय योजना बनाई है, जिसमें विभिन्न विभाग मिलकर काम करेंगे। अब तक 14 राज्यों ने पारे वाले उपकरणों की स्थिति का आकलन किया है और 12 राज्यों ने इनका उपयोग धीरे-धीरे बंद करने के आदेश जारी किए हैं। दिल्ली, पंजाब, मणिपुर, सिक्किम, गोवा, हरियाणा, लद्दाख, चंडीगढ़ और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में पारे वाले उपकरणों का उपयोग बंद हो चुका है।
पर्यावरण मंत्रालय का दृष्टिकोण
पर्यावरण मंत्रालय का क्या कहना है?
भारत मिनामाता कन्वेंशन के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पारे वाले मेडिकल उपकरणों को हटाने का कार्य सुरक्षित और दीर्घकालिक व्यवस्था के तहत किया जाए। - अमित राज; पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के निदेशक
विशेषज्ञों की एक टीम ने सफदरजंग अस्पताल का दौरा किया, जहां 2007 से पारे वाले उपकरणों का उपयोग बंद कर दिया गया था। टीम ने यह जानकारी प्राप्त की कि अस्पताल में पुराने उपकरणों के स्थान पर नए उपकरण कैसे खरीदे जाते हैं और पारे के कचरे को कैसे संभाला जाता है।
टीम ने उत्तर-पश्चिम दिल्ली की कुछ फैक्ट्रियों का भी दौरा किया, जहां मेडिकल उपकरणों की गुणवत्ता और उनकी सप्लाई से संबंधित समस्याओं की जानकारी ली गई। भारत के अस्पतालों से पारे वाले उपकरणों को हटाने के लिए सरकार, अस्पतालों, कंपनियों और अन्य संगठनों को मिलकर काम करना होगा। सरकार का लक्ष्य 2030 तक स्वास्थ्य सेवाओं से पारे वाले उपकरणों को हटाना है।
