भारत में फर्टिलिटी रेट में गिरावट: भविष्य की चुनौतियाँ
भारत की जनसंख्या और फर्टिलिटी रेट
भारत, जो दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। पहली बार, देश की प्रजनन दर में तेजी से गिरावट आ रही है, जिससे भविष्य में बुजुर्गों की संख्या बढ़ने की संभावना है और युवा कार्यबल में कमी आ सकती है। यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
किसी भी देश की शक्ति उसके नागरिकों, विशेषकर कार्यरत जनसंख्या पर निर्भर करती है। जितने अधिक लोग अर्थव्यवस्था में योगदान देंगे, उतनी ही अधिक प्रगति संभव है। वर्तमान में, युवा वर्ग अर्थव्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
फर्टिलिटी रेट की परिभाषा
भारत में जनसंख्या की अधिकता और संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती है। यदि जनसंख्या में कमी आती है, तो यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है। इसलिए, सभी देशों को अपने प्रजनन दर को नियंत्रित करना आवश्यक है। भारत में फर्टिलिटी रेट पिछले कुछ वर्षों से गिर रहा है, लेकिन यह अभी भी प्रतिस्थापन स्तर के करीब है।
हालिया SRS रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 1.9 बच्चे प्रति महिला हो गई है, जबकि पहले यह 2.1 थी। जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए इस दर का संतुलित रहना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, 2000 के दशक में भारत की TFR लगभग 3.3 बच्चे प्रति महिला थी, जो अब घटकर 1.9 हो गई है.
फर्टिलिटी रेट में कमी के कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रजनन दर में कमी के कई कारण हैं, जैसे जनसंख्या नियंत्रण के लिए जागरूकता कार्यक्रम, बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च, शिक्षा और गर्भनिरोधक साधनों की बेहतर उपलब्धता। जब महिलाओं को शिक्षा और गर्भनिरोधक साधनों तक पहुंच मिलती है, तो प्रजनन दर में गिरावट आती है।
इसके अलावा, पहले लोग अधिक बच्चे इसलिए पैदा करते थे क्योंकि कई बच्चों की मृत्यु हो जाती थी। भारत में शिशु मृत्यु दर में कमी आई है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और जागरूकता बढ़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, जिन राज्यों में शिक्षा का स्तर कम है, वहां प्रजनन दर अधिक है, जबकि उच्च शिक्षा वाले राज्यों में यह दर कम है।
डेमोग्राफिक डिविडेंड का महत्व
2005 में, भारत ने डेमोग्राफिक डिविडेंड के चरण में प्रवेश किया। इसका अर्थ है कि कामकाजी उम्र की जनसंख्या (15-64 वर्ष) का अनुपात बुजुर्गों और बच्चों की जनसंख्या से अधिक है। UNFPA के अनुसार, भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड 2055 तक बना रहने की उम्मीद है। इस अवधि में किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है।
1960 के दशक में जापान, सिंगापुर और हांगकांग में ऐसा हुआ, और 1980 के दशक में यह चीन के लिए फायदेमंद साबित हुआ। वर्तमान में, भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से आगे बढ़ रही है। हालांकि, यदि प्रजनन दर बहुत अधिक गिरती है, तो यह संतुलन को बिगाड़ सकती है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कोई व्यापक नीति नहीं बनाई है, लेकिन विभिन्न राज्य अधिक बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित करने के प्रयास कर रहे हैं।
