भारतीय राजनीति में अवसरवाद का उदय: 2026 का परिदृश्य
भारतीय राजनीति का नया दौर
भारत की राजनीति अब केवल अवसरवाद पर आधारित है, न कि दक्षिणपंथ, धर्मनिरपेक्षता या वामपंथ पर। 2014 और 2019 में भाजपा की जीत ने उसे एक महत्वपूर्ण समय दिया है, जो राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी है।
इस महीने संसद का मानसून सत्र शुरू होगा, लेकिन यह संसद 2024 के आम चुनाव में चुनी गई संसद से भिन्न होगी। मतदाताओं द्वारा भेजा गया विपक्ष अब पहले जैसा नहीं रहेगा। सत्तारूढ़ गठबंधन का आकार बढ़ा है, जबकि विपक्ष सिकुड़ गया है। यह बदलाव जनादेश से नहीं, बल्कि सांसदों की बदलती निष्ठा से आया है।
2024 का चुनाव महत्वपूर्ण था क्योंकि भाजपा पहली बार बहुमत से नीचे थी। इंडिया गठबंधन ने 234 सीटें जीतीं, जिससे कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं। यह एक ऐसा विपक्ष था जो सरकार को चुनौती दे सकता था। लेकिन अब, दो साल में, यह संतुलन फिर से बदल गया है।
भाजपा की शक्ति बढ़ी है, लेकिन असली समस्या भारतीय राजनीति की भाषा में बदलाव है। इंडिया गठबंधन केवल अंकगणित पर आधारित था, न कि विचारधारा पर। इसका साझा लक्ष्य केवल मोदी को तीसरी बार जीतने से रोकना था।
भारत की राजनीति में अब न तो वामपंथ है, न दक्षिणपंथ, न ही केवल हिंदुत्व। अवसरवाद अब सबसे प्रमुख सिद्धांत बन गया है। सत्ता के निकट रहना अधिक सुरक्षित माना जा रहा है।
इसलिए, दलबदल अब नैतिकता या विचारधारा का प्रश्न नहीं रह गया है। नेता अब यह नहीं पूछते कि कौन-सी विचारधारा सही है, बल्कि वे यह देखते हैं कि अगले दस वर्षों में सत्ता किसके हाथ में होगी।
राहुल गांधी की राजनीति अब भी संविधान और जवाबदेही की बात करती है, लेकिन यह एक ऐसे राजनीतिक समाज से संवाद कर रही है जिसकी प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं।
पिछले वर्षों में संस्थाओं की स्थिति कमजोर हुई है, जिससे लोगों में निराशा और थकान बढ़ी है। नीट जैसे मुद्दे भी अब वैसा राजनीतिक विस्फोट नहीं बन पाए हैं।
इस मानसून सत्र की असली परीक्षा यह होगी कि विपक्ष कितने सांसद वास्तव में विपक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं। भारत अभी एक दलीय राज्य नहीं है, लेकिन वह धीरे-धीरे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है जहाँ एक दल बाकी सभी दलों की राजनीति को निर्धारित करने लगेगा।
भारत की राजनीतिक कहानी अब भी लिखी जा रही है, लेकिन इसे समझने वाले लोग कम हैं।
