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भारतीय वैज्ञानिकों ने नाभिकीय संलयन में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की

भारतीय वैज्ञानिकों ने गांधीनगर में नाभिकीय संलयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार किया है। उन्होंने SST-1 टोकामाक मशीन में 82.6 गीगाहर्ट्ज का जाइरोट्रॉन सिस्टम सफलतापूर्वक चालू किया है, जिससे अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर रखा जा सकेगा। इस उपलब्धि के साथ, भारत ने सूरज के केंद्र से 20 गुना अधिक तापमान प्राप्त किया है। यह तकनीक प्रदूषणमुक्त ऊर्जा के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
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गांधीनगर में ऐतिहासिक उपलब्धि

गांधीनगर: भारतीय वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा और नाभिकीय संलयन (न्यूक्लियर फ्यूजन) को धरती पर साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार किया है। गुजरात के गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (IPR) के शोधकर्ताओं ने अपने फ्यूजन प्रोजेक्ट में एक जटिल तकनीकी चुनौती को सफलतापूर्वक हल किया है। वैज्ञानिकों ने 'SST-1 टोकामाक' मशीन में 82.6 गीगाहर्ट्ज का अत्याधुनिक 'जाइरोट्रॉन' (Gyrotron) सिस्टम चालू किया है। यह उपकरण उच्च-फ्रीक्वेंसी माइक्रोवेव तरंगों के माध्यम से अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को लंबे समय तक उच्च तापमान पर स्थिर रखने में सक्षम है।


भारत ने सूरज के केंद्र से 20 गुना अधिक तापमान प्राप्त किया

नाभिकीय संलयन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सूरज और अन्य तारे लगातार ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने फ्यूजन प्रयोगों में पहले ही 200 मिलियन डिग्री सेल्सियस (20 करोड़ डिग्री) से अधिक का प्लाज्मा तापमान उत्पन्न किया है, जो सूरज के कोर की तुलना में लगभग 20 गुना अधिक गर्म है। हालांकि, इस तापमान को बनाए रखना और नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती है। नया जाइरोट्रॉन सिस्टम इस प्लाज्मा को स्थिर रखकर नियंत्रित ऊर्जा उत्पन्न करने में मदद करेगा।


प्लाज्मा को दीवारों से बचाना एक चुनौती

प्लाज्मा पदार्थ की चौथी अवस्था है, जिसमें अति-उच्च तापमान पर परमाणु अपने इलेक्ट्रॉन्स खो देते हैं। इस स्थिति को संभालना इंजीनियरिंग का एक कठिन कार्य है, क्योंकि यदि यह प्लाज्मा रिएक्टर की दीवारों से टकरा जाए तो मशीनरी को गंभीर नुकसान हो सकता है। इस समस्या का समाधान करने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने SST-1 में शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड तैयार किया है, जो प्लाज्मा को दीवारों से दूर रखता है।


चीन को चुनौती, प्रदूषणमुक्त ऊर्जा का भविष्य

हाल ही में चीन ने अपने कृत्रिम सूरज के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट बनाने की घोषणा की थी, जिसके बाद भारत की यह उपलब्धि वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पारंपरिक परमाणु संयंत्रों की तुलना में, नाभिकीय फ्यूजन में रेडियोएक्टिव कचरा बहुत कम होता है और इसके लिए धरती पर ईंधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह तकनीक भविष्य में दुनिया को शून्य प्रदूषण वाली स्वच्छ ऊर्जा प्रदान कर सकती है। भारतीय वैज्ञानिकों की यह सफलता देश को फ्यूजन ऊर्जा आधारित कमर्शियल पावर प्लांट की दिशा में एक कदम और आगे ले जाएगी।