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भाषाओं का संकट: भारत में विलुप्ति की ओर बढ़ती 200 भाषाएं

भारत में भाषाओं का संकट गहराता जा रहा है, जहां लगभग 200 भाषाएं विभिन्न स्तरों के खतरे में हैं। यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से कई भाषाएं युद्ध और विस्थापन के कारण समाप्ति की ओर बढ़ रही हैं। इस लेख में जानें कि कैसे भाषा के खत्म होने से एक समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर भी समाप्त हो जाती है और इसे बचाने के लिए परिवारों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
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भाषा का विलुप्त होना: एक गंभीर समस्या


किसी भाषा का समाप्त होना केवल शब्दों का खत्म होना नहीं है; यह एक समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर, परंपराएं, और ज्ञान का भी अंत कर सकता है। भाषाविद् जब किसी भाषा के भविष्य का मूल्यांकन करते हैं, तो वे सबसे पहले यह देखते हैं कि क्या युवा पीढ़ी अपने माता-पिता से उस भाषा को सीख रही है।


यदि नई पीढ़ी भाषा को समझती है लेकिन उत्तर दूसरी भाषा में देती है, तो यह एक चेतावनी का संकेत है। धीरे-धीरे, यह भाषा केवल घर के बुजुर्गों तक सीमित हो जाती है, और अंततः जब अंतिम बोलने वाला चला जाता है, तो वह भाषा भी समाप्त हो जाती है।


639 भाषाएं पूरी तरह विलुप्त

एक अध्ययन में पाया गया है कि दुनिया में 639 भाषाएं पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं, जिनमें से 227 भाषाएं 1960 के बाद समाप्त हुईं। यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार, संकटग्रस्त भाषाओं में से 1,749 भाषाओं के बोलने वालों की संख्या 10,000 से कम थी। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे भी अधिक हो सकती है, क्योंकि कई भाषाएं लिखित रूप में दर्ज होने से पहले ही समाप्त हो गईं।


भारत में लगभग 200 भाषाएं संकट में

भारत भी भाषाई संकट से अछूता नहीं है। यूनेस्को के अनुसार, यहां लगभग 200 भाषाएं विभिन्न स्तरों के खतरे में हैं। इनमें 84 संकटग्रस्त, 62 निश्चित रूप से संकटग्रस्त, 6 गंभीर रूप से संकटग्रस्त और 35 बेहद गंभीर संकट वाली भाषाएं शामिल हैं। 1950 के बाद 9 भाषाओं के विलुप्त होने का भी उल्लेख है। इन भाषाओं के बोलने वालों की अनुमानित संख्या लगभग 2.7 करोड़ है।


युद्ध और विस्थापन का प्रभाव

युद्ध और विस्थापन भी भाषाओं के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। युद्ध के कारण, भाषा बोलने वाले लोग विभिन्न स्थानों पर चले जाते हैं, जिससे समुदाय बिखर जाता है और बच्चों को उस भाषा को सुनने और बोलने का अवसर कम मिलता है। उदाहरण के लिए, उबिख भाषा भी विस्थापन के कारण धीरे-धीरे समाप्त हुई। 1864 में उबिख समुदाय के एक बड़े हिस्से को काकेशस छोड़ना पड़ा, और तुर्की पहुंचने के बाद नई पीढ़ी को दूसरी भाषाओं पर निर्भर होना पड़ा। किसी भाषा को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या भाषाविदों की नहीं है; इसकी शुरुआत परिवार से होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों से मातृभाषा में बातचीत करें, लोकगीत सुनाएं और स्कूलों में स्थानीय भाषाओं को महत्व दें, ताकि नई पीढ़ी भाषा से जुड़ी रह सके।