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भूस्खलन से निपटने के लिए रेलवे ने अपनाया प्राकृतिक उपाय

सेंट्रल रेलवे ने भूस्खलन की समस्या से निपटने के लिए एक अभिनव प्राकृतिक उपाय अपनाया है। भोर घाट में वेटिवर घास के 10,000 पौधे लगाए गए हैं, जो मिट्टी को मजबूती प्रदान करते हैं और पानी के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। यह कदम पारंपरिक कंक्रीट और स्टील के विकल्प के रूप में कम लागत और पर्यावरण के अनुकूल समाधान पेश करता है। रेलवे इस प्रयोग के परिणामों का अध्ययन करेगा और यदि सफल रहा, तो इसे अन्य ढलानों पर भी लागू किया जा सकता है।
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प्राकृतिक उपाय से भूस्खलन की चुनौती का सामना


मानसून के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन रेलवे के लिए एक गंभीर समस्या बन जाता है। हाल ही में मुंबई-पुणे रेल मार्ग पर भोर घाट में बारिश के बाद हुए भूस्खलन ने इस खतरे को फिर से उजागर किया है। इस समस्या से निपटने के लिए सेंट्रल रेलवे ने कंक्रीट और स्टील के बजाय एक प्राकृतिक विकल्प का सहारा लिया है। रेलवे ने ढलानों पर वेटिवर घास के हजारों पौधे लगाए हैं, जो अपनी गहरी जड़ों के माध्यम से मिट्टी को मजबूती प्रदान करते हैं और पानी के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।


भोर घाट में वेटिवर के 10,000 पौधे

सेंट्रल रेलवे ने कर्जत और लोनावला के बीच भोर घाट क्षेत्र में लगभग 5,600 वर्ग मीटर का चयन किया है, जहां पायलट प्रोजेक्ट के तहत 10,000 वेटिवर पौधे लगाए गए हैं। यह कदम 6 जुलाई को हुई भारी बारिश के बाद उठाया गया, जिसने मुंबई-पुणे रेल यातायात को प्रभावित किया था। रेलवे अब इस प्राकृतिक उपाय के माध्यम से ढलान की स्थिरता का परीक्षण कर रहा है।


वेटिवर घास की विशेषताएँ

वेटिवर घास अपनी सुगंधित तेल और शरबत के लिए प्रसिद्ध है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबी और घनी जड़ें हैं, जो मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं और बारिश के दौरान सतह पर बहने वाले पानी की गति को कम करती हैं। इससे पानी का कुछ हिस्सा जमीन में समाहित होता है, जिससे मिट्टी के बहने की संभावना घटती है। इसलिए इसे ढलानों और तटबंधों की सुरक्षा के लिए एक प्रभावी प्राकृतिक विकल्प माना जाता है।


कंक्रीट का सस्ता और हरित विकल्प

अब तक रेलवे ढलानों को मजबूत करने के लिए कंक्रीट और स्टील जैसे पारंपरिक साधनों पर निर्भर रहा है। वेटिवर को इनकी तुलना में कम लागत वाला और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प माना जा रहा है। इसकी जड़ों की मजबूती मिट्टी को स्थिर रखने में मदद करती है। रेलवे के अनुसार, यह बायोइंजीनियरिंग तकनीक का पहला प्रयोग है, और यदि यह सफल होता है, तो इसका दायरा बढ़ाया जा सकता है।


पायलट प्रोजेक्ट का विस्तार

पायलट प्रोजेक्ट के लिए भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र से लगभग 1 किलोमीटर और 15 किलोमीटर दूर दो स्थानों का चयन किया गया है। इस परियोजना पर लगभग 5 लाख रुपये का खर्च आएगा। रेलवे अगले कुछ मानसून के दौरान घास के प्रभाव का अध्ययन करेगा। यदि परिणाम संतोषजनक रहे, तो भूस्खलन की आशंका वाले अन्य ढलानों पर भी वेटिवर लगाया जा सकता है, जिससे रेलवे को कम लागत में एक दीर्घकालिक प्राकृतिक सुरक्षा उपाय मिल सकेगा।