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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने साइंटिफिक एविडेंस के आधार पर रेप के आरोपी को बरी किया

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में साइंटिफिक एविडेंस को गवाहों के बयानों से अधिक विश्वसनीय मानते हुए, दुष्कर्म के मामले में 10 साल की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया। डीएनए परीक्षण ने साबित किया कि आरोपी नवजात बच्चे का जैविक पिता नहीं है। पीड़िता ने अपने बयान से पलटते हुए कहा कि उसने अपनी मां के दबाव में आरोपी का नाम लिया था। जानें इस केस के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में।
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महत्वपूर्ण निर्णय: साइंटिफिक एविडेंस की भूमिका

भोपाल: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में वैज्ञानिक साक्ष्यों को गवाहों के बयानों से अधिक विश्वसनीय मानते हुए, दुष्कर्म के मामले में 10 साल की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। डीएनए परीक्षण की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि दुष्कर्म पीड़िता के नवजात बच्चे का जैविक पिता वह आरोपी नहीं है, जिसे निचली अदालत ने दोषी ठहराया था। जस्टिस देवनारायण मिश्रा की एकल पीठ ने सिवनी सेशंस कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 साल की कठोर सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया।


डीएनए परीक्षण ने आरोपी को बरी किया, सच सामने आया
फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट में यह पाया गया कि पीड़िता, उसके नवजात बच्चे और आरोपी के रक्त नमूनों के डीएनए परीक्षण में मां और बच्चे का डीएनए मेल खाता है, लेकिन आरोपी और बच्चे के डीएनए का कोई मेल नहीं हुआ। अदालत ने इस रिपोर्ट को मुख्य आधार मानते हुए कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य किसी भी गवाह के मौखिक बयानों की तुलना में अधिक मजबूत और निष्पक्ष होते हैं। इस निष्कर्ष ने अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए दुष्कर्म के आरोप को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया।


पीड़िता ने अपने बयान से पलटी, मां के दबाव में लिया था नाम
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता अपने पूर्व बयानों से मुकर गई। उसने पहले पुलिस और अदालत के सामने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, लेकिन जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसकी मां के दबाव में उसने उस व्यक्ति का नाम लिया था। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष का यह दावा भी गलत साबित हुआ कि आरोपी घर में जबरन घुसा था। गवाहों ने स्पष्ट किया कि आरोपी का पीड़िता के घर में पहले से ही आना-जाना था, जिसके बाद अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।