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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: बालिगों के अधिकारों की रक्षा

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के स्थान और साथी के साथ रहने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि जब तक किसी पर दबाव नहीं है, तब तक अभिभावक की भूमिका नहीं निभाई जा सकती। इस मामले में एक मां ने अपनी बेटी के अपहरण का आरोप लगाया था, लेकिन अदालत ने युवती की इच्छा का सम्मान करते हुए याचिका खारिज कर दी। जानें इस फैसले के सभी पहलुओं के बारे में।
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का निर्णय


 


नई दिल्ली। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के स्थान और साथी के साथ रहने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि जब तक किसी वयस्क पर कोई दबाव या अवैध रोक-टोक नहीं है, तब तक न्यायालय अभिभावक की भूमिका नहीं निभा सकते और न ही उनकी कस्टडी माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति को सौंपने का आदेश दे सकते हैं।


मां का आरोप

यह मामला रांझी के गोकलपुर क्षेत्र से संबंधित है, जहां एक महिला ने उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। उसने आरोप लगाया कि रितिक चौधरी ने उसकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए, उच्च न्यायालय ने पुलिस को निर्देश दिया कि युवती को अदालत में पेश किया जाए।


युवती की बात

सुनवाई के दौरान, पुलिस युवती को अदालत में लेकर आई। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने युवती से अकेले में बातचीत की। युवती ने अदालत को बताया कि वह बालिग है और अपनी इच्छा से रितिक चौधरी के साथ गई है। उसने यह भी कहा कि वह उसी के साथ रहना चाहती है और अपने माता-पिता के पास वापस नहीं जाना चाहती। युवती ने स्पष्ट किया कि उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला गया है।


उच्च न्यायालय की टिप्पणी

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से कहीं रह रहा है और उसे अवैध रूप से हिरासत में नहीं रखा गया है, तो संवैधानिक अदालत उसकी कस्टडी किसी अन्य व्यक्ति, यहां तक कि उसके माता-पिता को भी नहीं सौंप सकती।


अदालत ने यह भी कहा कि न्यायालयों को मां की भावनाओं या पिता के अहंकार से प्रेरित होकर 'सुपर गार्जियन' की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल उन्हीं मामलों में लागू होती है, जहां किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो।


याचिका का निराकरण

सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद, उच्च न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण करते हुए उसे खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि बालिग व्यक्ति को अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने का संवैधानिक अधिकार है।