मानसून की कमी और किसानों की बढ़ती चिंताएं
मानसून की स्थिति
इस वर्ष मानसून की स्थिति चिंताजनक है। बंगाल की खाड़ी में कोई प्रभावी कम दबाव का क्षेत्र नहीं बन रहा है, जिससे मानसून की प्रगति में बाधा आ रही है। पहले केरल में मानसून ने कई दिन तक रुकावट का सामना किया और अब यह फिर से अटका हुआ है। 14 जून को सेटेलाइट तस्वीरों में मानसून के बादल दिखाई दिए, लेकिन अगले दिन वे गायब हो गए। पूर्वी राज्यों जैसे बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में मानसून की निर्धारित तिथि बीत चुकी है, फिर भी बारिश नहीं हुई है। अगले हफ्ते भी यही स्थिति बनी रहने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष सामान्य से 50 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
किसानों की चिंताएं
बारिश की कमी के कारण पानी की समस्या उत्पन्न हो गई है, जिससे खरीफ की फसल के लिए किसान चिंतित हैं। नदियां और नहरें सूख गई हैं, और पूर्वी भारत में भूमिगत जल स्तर भी गिर रहा है। यदि किसानों के पास बोरवेल या पम्पिंग सेट हैं, तो उन्हें इन्हें चलाने के लिए बिजली या डीजल की आवश्यकता होती है।
हालांकि, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में किसान पम्पिंग सेट का उपयोग करते हैं, जिसके लिए डीजल की आवश्यकता होती है, जो अब बाजार में उपलब्ध नहीं है। सरकार ने डीजल की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय किए हैं, जिससे किसानों को डीजल प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है।
सरकार ने यह अनिवार्य कर दिया है कि गैलन या कंटेनर में डीजल नहीं लिया जा सकता। छोटे किसान बड़े किसानों या साहूकारों पर निर्भर हैं और अधिक कीमत पर डीजल खरीदने को मजबूर हैं।
खाद और बीज की कमी
किसानों की समस्याएं यहीं खत्म नहीं होतीं। उन्हें खाद और बीज की भी कमी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार का दावा है कि उसके पास पर्याप्त खाद का स्टॉक है, लेकिन किसानों को केवल पांच किलो खाद मिल रही है, जबकि उन्हें 15 किलो की आवश्यकता है।
कई कृषि राज्यों से रिपोर्ट्स आ रही हैं कि किसान खाद और बीज के लिए रात भर कतार में खड़े रहते हैं। यूरिया और डीएपी जैसे आवश्यक उर्वरक बाजार से गायब हो रहे हैं।
सरकार ने 17 लाख टन यूरिया आयात किया है, लेकिन यह भी बाजार में आने से पहले ही गायब हो रहा है। इस बार पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण समस्या बढ़ी है, लेकिन खेती के समय डीजल, खाद और पानी की कमी एक पुरानी समस्या है।
