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मानसून की देरी: किसानों के लिए बढ़ते संकट का सामना

जून का महीना आधा बीत चुका है, लेकिन मानसून की अनुपस्थिति ने किसानों के लिए संकट पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया पर सावन के आगमन की चर्चा हो रही है, जबकि वास्तविकता में पश्चिमी विक्षोभों के कारण बारिश हो रही है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के चलते, किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जानें कैसे सरकार और मौसम एजेंसियां इस स्थिति का सामना कर रही हैं और किसानों को क्या कदम उठाने चाहिए।
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मानसून की देरी: किसानों के लिए बढ़ते संकट का सामना

मानसून की अनुपस्थिति


जून का आधा समय बीत चुका है, लेकिन मानसून अभी तक नहीं आया है। सोशल मीडिया पर सावन के आगमन की चर्चा हो रही है, जबकि वास्तव में तेज आंधी और बारिश पश्चिमी विक्षोभों के कारण हो रही है। मानसून आंध्र प्रदेश के आस-पास फंसा हुआ है, और इस साल का चौमासा गर्मी और उमस से भरा हो सकता है।


हालांकि, ये शब्द जैसे 'अधमरी' और 'बरबादी' बहुत गंभीर हैं, लेकिन अगर कोई विदेशी भारत की गर्मी और प्रदूषण का अनुभव करने आए, तो उन्हें भी असहनीय स्थिति का सामना करना पड़ेगा। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री ने दिल्ली की गर्मी को असहनीय बताया। जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होगा।


इस बीच, अडानी समूह कोयले की खदानों का विस्तार कर रहा है, जबकि सरकार जलवायु संकट की अनदेखी कर रही है। असल समस्या यह है कि 2026 के चौमासे में किसानों को कई संकटों का सामना करना पड़ेगा।


जलवायु मॉडल एल नीनो के प्रभाव की चेतावनी दे रहे हैं, जिससे मानसून की धाराएं प्रभावित हो रही हैं। यदि मौसम पूर्वानुमान सही साबित होते हैं, तो अगस्त और सितंबर में गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।


सरकार और सोशल मीडिया किसानों को यह विश्वास दिला रहे हैं कि सब कुछ सामान्य है, जबकि वास्तविकता में किसान मानसून की उम्मीद में हैं। हाल ही में मैंने देखा कि दिल्ली से अलवर जाते समय बाजरे की बुवाई हो रही थी, जबकि मानसून आमतौर पर 27-29 जून के बीच आता है।


इसलिए, जलवायु परिवर्तन के बावजूद सरकारी स्तर पर कोई जोखिम प्रबंधन नहीं किया जा रहा है। किसानों को सलाह देने की कोई व्यवस्था नहीं है कि उन्हें क्या करना चाहिए यदि मानसून भटकता है।