यमन में संघर्ष का बढ़ता तनाव: भारत का ऐतिहासिक संबंध
यमन में संघर्ष की नई लहर
नई दिल्ली: यमन में हाल के दिनों में संघर्ष में तेजी आई है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। हूती विद्रोहियों और यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं उत्पन्न की हैं। इस संघर्ष को ईरान और सऊदी अरब के बीच प्रभाव की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि, इस घटनाक्रम का एक कम चर्चित ऐतिहासिक पहलू भारत से भी जुड़ा हुआ है।
अदन का ऐतिहासिक महत्व
इतिहास के अनुसार, 1839 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने दक्षिणी यमन के प्रमुख बंदरगाह अदन पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद अदन और उसके आसपास के क्षेत्रों को बॉम्बे प्रेसिडेंसी के प्रशासन के अधीन रखा गया। उस समय दक्षिणी यमन का प्रशासन भारत से संचालित होता था और वहां भारतीय रुपया आधिकारिक मुद्रा के रूप में प्रचलित था।
दक्षिणी यमन 1937 तक बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा रहा। इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने इसे अलग उपनिवेश बना दिया, लेकिन भारतीय रुपया 1951 तक वहां की आधिकारिक मुद्रा बना रहा। ब्रिटिश शासन के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय व्यापारी और कर्मचारी अदन में बसे। प्रसिद्ध उद्योगपति धीरूभाई अंबानी ने भी अपने करियर की शुरुआत अदन से की थी, जबकि मुकेश अंबानी का जन्म भी अदन में हुआ था।
उत्तर और दक्षिण यमन का अलग इतिहास
उत्तर और दक्षिण यमन का राजनीतिक इतिहास अलग रहा है। उत्तर यमन 1918 तक ऑटोमन साम्राज्य के अधीन था, जबकि दक्षिण यमन ब्रिटिश नियंत्रण में रहा। 1967 में दक्षिण यमन को ब्रिटेन से स्वतंत्रता मिली और वह एक समाजवादी राष्ट्र बना। इसके बाद 1990 में उत्तर और दक्षिण यमन का विलय हुआ और आधुनिक यमन का गठन हुआ।
हूती विद्रोह की शुरुआत
यमन के उत्तरी हिस्से में रहने वाले जैदी शिया समुदाय से जुड़े हूती विद्रोहियों ने 2004 से सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। 2011 के अरब स्प्रिंग के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और 2014 में हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद राष्ट्रपति अब्द रब्बु मंसूर हादी को सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी।
हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन मिलने के आरोपों के बीच 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में सैन्य अभियान शुरू किया। इसके बाद से यह संघर्ष एक व्यापक क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष का रूप ले चुका है।
तनाव का बढ़ना
हालिया घटनाक्रम में यमन सरकार से जुड़े बलों ने सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रनवे पर हमला किया। रिपोर्टों के अनुसार, यह कार्रवाई कथित तौर पर ईरान से आने वाले एक विमान को उतरने से रोकने के उद्देश्य से की गई। इसके जवाब में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के अबहा हवाई अड्डे पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यमन का मौजूदा संघर्ष केवल आंतरिक गृहयुद्ध नहीं, बल्कि ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का भी हिस्सा है। ऐसे में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए यमन का महत्व
यमन भारत के लिए केवल रणनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण रहा है। अदन का ब्रिटिश भारत के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा होना, वहां भारतीय रुपये का चलन और बड़ी संख्या में भारतीयों की मौजूदगी इस ऐतिहासिक रिश्ते की याद दिलाती है। वर्तमान में भी लाल सागर और अदन की खाड़ी वैश्विक समुद्री व्यापार के प्रमुख मार्ग हैं, जिनका भारत के व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा से सीधा संबंध है।
