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राज्यसभा में एंटी पेपर लीक बिल पर मल्लिकार्जुन खरगे की टिप्पणी से हंगामा

राज्यसभा में बुधवार को एंटी पेपर लीक बिल पेश किया गया, जिसमें विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर आरोप लगाते हुए छात्रों की समस्याओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। उनके मनुस्मृति पर की गई टिप्पणी ने सदन में हंगामा मचा दिया, जिसके चलते कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। जानें इस विवाद के पीछे की पूरी कहानी और सदन में हुई बहस के प्रमुख बिंदु।
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राज्यसभा में एंटी पेपर लीक बिल का प्रस्तुतिकरण


नई दिल्ली: बुधवार को राज्यसभा में एंटी पेपर लीक बिल पेश किया गया, जिसे राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन में रखा। इस बिल पर चर्चा की शुरुआत विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने की, जिन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले 12 वर्षों में पहली बार शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने छात्रों की समस्याओं को नजरअंदाज किया है। इसके बाद नेता सदन जेपी नड्डा ने छात्रों को बुलाने का निर्णय लिया।


खरगे की टिप्पणी से सदन में हंगामा

खरगे ने कहा, "अगर यह पहले किया गया होता, तो छात्रों को लाठियों का सामना नहीं करना पड़ता।" उनके इस बयान के बाद सदन में हंगामा मच गया, जिसके कारण प्रश्नकाल नहीं हो सका और राज्यसभा की कार्यवाही तीन बजे तक स्थगित कर दी गई।


मनुस्मृति पर टिप्पणी से बढ़ा विवाद

खरगे ने मनुस्मृति पर एक टिप्पणी की, जिसने सदन का माहौल गरमा दिया। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति ने शिक्षा में जातिवाद को बढ़ावा दिया है। इस पर सत्ता पक्ष के सांसद भड़क गए और 'माफी-माफी' के नारे लगाने लगे। इस हंगामे के बीच सभापति ने कहा कि खरगे की टिप्पणियों को कार्यवाही से हटा दिया जाएगा।


जेपी नड्डा और सुधांशु त्रिवेदी का पलटवार

नेता सदन जेपी नड्डा ने खरगे के बयान को तथ्यहीन बताया और मांग की कि मनुस्मृति के मूल पाठ को प्रमाणित किया जाए। सुधांशु त्रिवेदी ने भी इस पर अपनी बात रखी, जिसमें उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जज विलियम जोंस और डॉ. आंबेडकर की किताबों का उल्लेख किया।


कार्यवाही स्थगित और बयान हटाए गए

हंगामे को बढ़ता देख सभापति ने खरगे के बयान को कार्यवाही से हटाने का ऐलान किया। इसके बावजूद शोर जारी रहा, जिसके कारण सदन को स्थगित करना पड़ा।