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वंदे मातरम और जन गण मन: शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत के बीच बहस

हाल ही में 'वंदे मातरम' और 'जन गण मन' के बीच के अंतर पर चर्चा छिड़ गई है, जिसमें शर्मिला टैगोर ने अपने विचार साझा किए हैं। कंगना रनौत ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शर्मिला जी की सोच को सीमित बताया और हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आने की अपील की। जानें इस बहस में दोनों के दृष्टिकोण और उनके विचारों का टकराव।
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वंदे मातरम और जन गण मन पर चर्चा

हाल ही में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' और राष्ट्रगान 'जन गण मन' के बीच के अंतर को लेकर एक नई बहस शुरू हुई है। इस संदर्भ में, वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने अपने विचार साझा किए। उनके बयान के बाद, कंगना रनौत ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कंगना ने कहा कि शर्मिला जी के सीमित दृष्टिकोण को देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ और उन्होंने उनसे हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आने की अपील की।


वंदे मातरम का इतिहास

'वंदे मातरम' की रचना 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चटर्जी ने की थी, जो उनके उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक महत्वपूर्ण नारा बन गया। इसके पहले दो पद देश की सुंदरता और भूमि की प्रशंसा करते हैं, जबकि बाद के चार पदों में हिंदू देवियों जैसे दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का उल्लेख है। इस समय बहस इस बात पर है कि क्या सभी पदों को समान रूप से स्वीकार किया जा सकता है। कुछ का मानना है कि यह देश की भावना का प्रतीक है, जबकि अन्य का कहना है कि हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख इसे अन्य धर्मों के लोगों के लिए अपनाना कठिन बना सकता है।


शर्मिला टैगोर का दृष्टिकोण

एक साक्षात्कार में, शर्मिला टैगोर ने कहा, 'मेरा मानना है कि कई धार्मिक लोग केवल एक भगवान को मानते हैं, न कि कई को। 'वंदे मातरम' के एक हिस्से में कई देवी-देवताओं का उल्लेख है।' उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए 'वंदे काली, वंदे दुर्गा' कहना आसान नहीं है। इसलिए, यदि हम सभी धर्मों के लोगों को एक साथ लाना चाहते हैं, तो पहले दो पद ही सबसे उपयुक्त हैं।


कंगना रनौत की प्रतिक्रिया

कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर के इंटरव्यू का वीडियो अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर साझा करते हुए लिखा, 'मैं इस बात की सराहना करती हूं कि शर्मिला जी ने वंदे मातरम पर अपनी हिचकिचाहट के बारे में बात की है, लेकिन एक कलाकार के रूप में मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनकी सोच कला या कविता के प्रति इतनी सीमित कैसे हो सकती है। किसी भी कविता या गाने में शब्द केवल संकेत होते हैं। एक कवि या कलाकार अपनी बात का गहरा प्रभाव छोड़ने के लिए विभिन्न कल्पनाओं और उदाहरणों का उपयोग करता है। वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम की भावना का प्रतीक है। बंकिम चंद्र जी देशवासियों को अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आप इस महान कृति को केवल एक धार्मिक संदर्भ में कैसे सीमित कर सकती हैं?'


स्वामी विवेकानंद का उदाहरण

कंगना ने आगे लिखा, 'स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मुझे ऐसे युवा चाहिए जिनकी मांसपेशियां लोहे की, हड्डियां स्टील की और नसें बिजली जैसी मजबूत हों। वह मौसम की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि लोगों से उनकी आंतरिक शक्ति को जागृत करने की अपील कर रहे थे। कृपया इस हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आएं। भले ही हम एक ही भगवान को मानते हों, लेकिन डॉक्टर भी ताकत को शक्ति ही कहते हैं। आइए हम सभी एक-दूसरे को गले लगाएं। मैं आपसे बहुत प्यार करती हूं और आपकी ओर से मिलने वाली प्यार भरी झप्पी का स्वागत करती हूं, जैसी आप हमेशा मुझे देती हैं।