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विपक्ष के बिखराव का संकेत: संसद सत्र से पहले की स्थिति

संसद के मानसून सत्र से पहले, भाजपा विरोधी दलों के बीच एकता की कमी स्पष्ट हो रही है। 'इंडिया' ब्लॉक का बिखराव और कांग्रेस से दूरी बनाते हुए कई दलों ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। जानें कैसे यह स्थिति सरकार के लिए फायदेमंद हो सकती है और विपक्ष की एकता में कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं।
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विपक्ष की एकता में कमी


संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले, भाजपा विरोधी दलों के बीच एकता की कमी को दर्शाने वाला एक जुमला उभरा है, जिसमें कहा गया है कि इन दलों को केवल 'विपक्ष' के रूप में संबोधित किया जाए। यह टिप्पणी उन नेताओं द्वारा की गई है, जो हाल के दिनों में कांग्रेस से दूर होते जा रहे हैं और भाजपा के करीब आ रहे हैं। इसका तात्पर्य है कि 2023 में गठित 'इंडिया' ब्लॉक, जो 2024 के चुनावों में एकजुट होकर लड़ा गया था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है। संसद का सत्र, जो 20 जुलाई से शुरू हो रहा है, इस बिखराव को और स्पष्ट करेगा।


पिछले सत्रों में विपक्ष एकजुट होकर सरकार को घेरने का प्रयास करता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिखेगा। विपक्ष की विभिन्न पार्टियाँ कुछ मुद्दों पर एकजुट हो सकती हैं, लेकिन यह एकता हर मुद्दे पर नहीं दिखाई देगी।


संसद सत्र से पहले, कई भाजपा विरोधी दलों ने स्पष्ट किया है कि वे विपक्ष में हैं, लेकिन 'इंडिया' ब्लॉक का हिस्सा नहीं हैं। हर संसद सत्र से पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यालय में विपक्ष की बैठक होती रही है। इस बार भी 20 जुलाई को बैठक बुलाई गई है, लेकिन कुछ नेताओं ने इसे 'इंडिया' ब्लॉक की बैठक नहीं कहने की मांग की है।


उनका कहना है कि यदि इसे 'इंडिया' ब्लॉक की बैठक कहा गया, तो उनके लिए इसमें शामिल होना कठिन होगा। वे अभी भी भाजपा विरोधी हैं, लेकिन कांग्रेस के किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहते। इस स्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ये पार्टियाँ खड़गे के कार्यालय में होने वाली बैठक में शामिल होंगी या नहीं।


इस स्थिति का लाभ सरकार को मिल रहा है। सूत्रों के अनुसार, तमिलनाडु की प्रमुख विपक्षी पार्टी डीएमके और पंजाब में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी ने यह स्पष्ट किया है कि वे कांग्रेस के साथ नहीं दिखेंगे। आम आदमी पार्टी को अगले साल पंजाब और गोवा में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ना है, इसलिए वह कांग्रेस के साथ दिखने का जोखिम नहीं ले सकती।


डीएमके ने भी कांग्रेस से दूरी बना ली है और भाजपा के करीब आ रही है। यदि ऐसा होता है, तो यह विपक्ष के लिए एक बड़ा झटका होगा, क्योंकि डीएमके के पास लोकसभा में 22 सांसद हैं। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद पहले ही सरकार के साथ जा चुके हैं। शरद पवार की एनसीपी 'इंडिया' ब्लॉक का हिस्सा है, लेकिन वह भी केंद्र सरकार को मुद्दों पर आधारित समर्थन देने के लिए तैयार है।