सरदार पटेल का राष्ट्रीय एकता दिवस: एक ऐतिहासिक पुनर्स्मरण
राष्ट्रीय एकता दिवस का महत्व
31 अक्टूबर 2026 का राष्ट्रीय एकता दिवस केवल एक साधारण वर्षगांठ नहीं है। यह सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा आयोजित दो वर्षीय राष्ट्रव्यापी स्मरणोत्सव का समापन भी है, जो उनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में 31 अक्टूबर 2024 को आरंभ हुआ था। यह एक अवसर है यह सोचने का कि किस प्रकार एक व्यक्ति ने 560 से अधिक रियासतों को एकजुट कर आधुनिक भारत का निर्माण किया और उसे राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में उचित स्थान मिला।
सरदार पटेल का सम्मान
सरदार पटेल का निधन दिसंबर 1950 में हुआ। देश के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उनके योगदान को पाठ्यपुस्तकों में तो जगह मिली, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों में उनकी उपस्थिति सीमित रही। उन्हें मरणोपरांत 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो उनके निधन के चार दशक बाद था।
यह सम्मान किसी एक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि यह उस राजनीतिक विमर्श का परिणाम था, जिसमें स्वतंत्र भारत के निर्माण की कहानी कुछ चुनिंदा चेहरों के माध्यम से बताई जाती रही। हैदराबाद, जूनागढ़ और अन्य रियासतों के विलय का श्रेय जिस व्यक्ति को जाता था, उसकी जयंती दशकों तक औपचारिक पुष्पांजलि से आगे नहीं बढ़ी।
2014 में बदलाव
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसके साथ 'रन फ़ॉर यूनिटी' और एकता की शपथ जैसे कार्यक्रम स्कूलों, दफ्तरों, थानों और छावनियों तक पहुंचे। जो जयंती पहले सरकारी कैलेंडर की एक तारीख़ थी, वह अब जन-भागीदारी का अवसर बन गई।
यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं था। एकता दिवस ने सरदार पटेल को एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व से आगे बढ़ाकर एक जीवंत राष्ट्रीय विचार के रूप में स्थापित किया: देश की अखंडता हर नागरिक का साझा दायित्व है।
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी
31 अक्टूबर 2018 को नर्मदा तट पर, सरदार सरोवर बांध के सामने, 182 मीटर ऊंची स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी का उद्घाटन हुआ। यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। इसकी परिकल्पना नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते की थी, और इसके लिए देशभर के गांवों से किसानों के पुराने औज़ारों का लोहा जुटाने का अभियान चलाया गया था।
आज केवड़िया का इलाका एकता नगर के नाम से जाना जाता है, जहां संग्रहालय सरदार के जीवन और प्रतिमा के निर्माण की कहानी सुनाता है। प्रतिमा की ऊंचाई अपने आप में एक वक्तव्य है: जिस व्यक्ति के योगदान को लंबे समय तक छोटा करके देखा गया, उसे अब राष्ट्र सबसे ऊंचे स्थान पर देखता है।
एकता परेड का आयोजन
2019 से एकता नगर में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में एकता दिवस परेड आयोजित की जा रही है। 2025 में गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि अब हर वर्ष 31 अक्टूबर को एकता नगर में गणतंत्र दिवस परेड की तर्ज़ पर भव्य परेड होगी।
इस वर्ष की परेड में कई नई चीज़ें होंगी। पहली बार संध्या परेड होगी, जिसमें सशस्त्र नक्सलवाद के उन्मूलन पर विशेष प्रस्तुति होगी। देश के पहले गृह मंत्री की जयंती पर आंतरिक सुरक्षा की इस उपलब्धि का प्रदर्शन अपने आप में महत्वपूर्ण है।
सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार
सितंबर 2019 में गृह मंत्रालय ने 'सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार' की स्थापना की। यह राष्ट्र की एकता और अखंडता में योगदान के लिए देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसकी घोषणा हर वर्ष एकता दिवस पर की जाती है।
उसी वर्ष 31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में अस्तित्व में आए। अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद हुए इस प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए सरदार की जयंती की तिथि का चुना जाना गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखता है।
150वीं जयंती का स्मरणोत्सव
अक्टूबर 2024 में केंद्र सरकार ने सरदार की 150वीं जयंती को 2024 से 2026 तक दो वर्ष के राष्ट्रव्यापी स्मरणोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की। 2025 में प्रधानमंत्री ने एकता नगर में 150 रुपये का स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी किया।
यह क्रम एक बड़े प्रयास का हिस्सा है। इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा, बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस का दर्जा और सरदार पटेल का यह पुनर्स्मरण एक ही सूत्र से जुड़े हैं: स्वाधीनता और राष्ट्र-निर्माण की कथा में उन सभी को उनका स्थान लौटाना, जिन्हें लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया।
स्मृति का स्थायी ढांचा
किसी महापुरुष के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता की असली कसौटी यह है कि वह स्मृति कितनी स्थायी है। भाषण और पुष्पांजलियां एक दिन की होती हैं। एक निर्धारित राष्ट्रीय दिवस, दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा, हर वर्ष होने वाली राजकीय परेड और एक सर्वोच्च नागरिक सम्मान पीढ़ियों तक बने रहते हैं।
बीते बारह वर्षों में सरदार पटेल को यही मिला है: स्मरण का एक स्थायी ढांचा। आज जब दो वर्ष का स्मरणोत्सव पूरा हो रहा है, तो एकता नगर में उमड़ने वाली भीड़ इस बात की गवाह है कि लौह पुरुष अब इतिहास की किताबों से निकलकर राष्ट्र के उत्सवों के केंद्र में हैं।
लेखक का परिचय
नीलकांत बक्शी
पूर्व- सह प्रभारी मीडिया एवं सोशल मीडिया, मीडिया रिलेशन हेड भाजपा, दिल्ली
