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सहारनपुर में मस्जिद का ध्वंस: ओवैसी ने उठाए सवाल

सहारनपुर कलेक्ट्रेट में स्थित मस्जिद को ध्वस्त करने की घटना ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, सवाल उठाते हुए कि क्या मुसलमानों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार अब समाप्त हो गया है। उन्होंने सरकार की कार्रवाई को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं और मस्जिद के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया है। ओवैसी का कहना है कि यह मस्जिद एक सदी से अधिक समय से मौजूद है और इसे गिराना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
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सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मस्जिद का ध्वंस

लखनऊ। सहारनपुर कलेक्ट्रेट में स्थित मस्जिद को शनिवार सुबह पांच बजे ध्वस्त कर दिया गया। इस घटना ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इस पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या मुसलमानों के लिए अब धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार भी समाप्त हो गया है?

ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "सहारनपुर कलेक्ट्रेट में स्थित मस्जिद को आज सुबह 5 बजे गिरा दिया गया। क्या मुसलमानों के लिए अब धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार भी नहीं बचा है? हमारी पूजा स्थलों पर बार-बार कमजोर और मनगढ़ंत कारणों के आधार पर बुलडोज़र क्यों चलाया जाता है?"

मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 के दस्तावेज़ पेश कर यह साबित करने का प्रयास किया कि यह मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी। एक सदी से अधिक समय से वहां नियमित रूप से नमाज़ अदा की जाती रही है। इसका मतलब यह है कि यह कोई नई इमारत नहीं है, बल्कि लंबे समय से एक पूजा स्थल के रूप में कार्यरत है। यही वक्फ़ बाय यूज़र का आधार है, जिसे कानून में मान्यता प्राप्त है।

उन्होंने आगे कहा कि Limitation Act का यही सिद्धांत है कि सरकार किसी भूमि पर एक सदी से अधिक पुरानी, सार्वजनिक और लगातार चल रही कब्जेदारी को अचानक नजरअंदाज नहीं कर सकती। जब एक सदी से अधिक समय से खुला और लगातार कब्जा रहा है, तो राज्य यह कैसे मान सकता है कि कब्जा कल से शुरू हुआ था? यदि सरकार की दलील मान भी ली जाए, तो इतने लंबे समय की कब्जेदारी के बाद adverse possession का मुद्दा तो उठेगा ही।

ओवैसी ने कहा, "मस्जिद पहले थी, कलेक्ट्रेट बाद में आया। कुछ लोगों को शायद मस्जिद दिखने पर परेशानी होती है। लेकिन यह उनका मुद्दा है, हमारा नहीं। यदि आप नजरें फेरना चाहते हैं, तो फेर लें। लेकिन अपनी खुन्नस मिटाने के लिए हमारी मस्जिद पर बुलडोज़र नहीं चला सकते। मेरी धार्मिक स्वतंत्रता आपकी दया पर निर्भर नहीं है।"