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सुप्रीम कोर्ट का जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का अधिकार: रामलीला मैदान का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। कोर्ट ने रामलीला मैदान को प्राथमिक प्रदर्शन स्थल बनाने की याचिका पर विचार किया है, जबकि पहले जंतर-मंतर को इस उद्देश्य के लिए निर्धारित किया गया था। जानें इस मामले में कोर्ट ने क्या कहा और सरकार की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय


सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही स्पष्ट किया है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है। इस स्थिति को अब नहीं बदला जाना चाहिए।


यह चिंताजनक है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जंतर-मंतर को प्राथमिक विरोध स्थल से हटाकर रामलीला मैदान को निर्धारित करने की याचिका को गंभीरता से लिया है। नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों पर कई प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। ऐसे में यह आशंका है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को सरकार एक अवसर के रूप में देख सकती है। हाल ही में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि राष्ट्रीय राजधानी में रामलीला मैदान को प्राथमिक प्रदर्शन स्थल बनाया जाए। कोर्ट ने इसे “महत्वपूर्ण मामला” मानते हुए सॉलीसिटर जनरल को केंद्र से इस पर सलाह लेने का निर्देश दिया।


यह ध्यान देने योग्य है कि तीन दशक पहले बोट क्लब विरोध प्रदर्शन का प्राथमिक स्थल था, जो संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित है। तत्कालीन सत्ताधारियों ने असहमति के स्वर को दबाने के लिए जंतर-मंतर को प्राथमिक स्थल बना दिया। वर्तमान में, दिल्ली पुलिस के नियमों के अनुसार, यदि किसी प्रदर्शन में 1,000 से कम लोग शामिल होते हैं, तो जंतर-मंतर पर आयोजन की अनुमति दी जाती है। जबकि 1,000 से अधिक लोगों के लिए रामलीला मैदान को निर्धारित किया गया है। हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए 'कॉकरोच' प्रदर्शन ने सरकार के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न की हैं।


सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने के आदेश को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा था कि जंतर-मंतर या बोट क्लब जैसी जगहों पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि यह संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। अब इस मानक को नहीं बदला जाना चाहिए। लोगों की आवाज संसद और सरकार तक पहुँच सके, इसके लिए निकटतम स्थान पर प्रदर्शन का अधिकार बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।