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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: लॉ छात्रों के खिलाफ BCI के अधिकारों पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के लॉ छात्रों के खिलाफ कार्रवाई को खारिज कर दिया है। यह मामला नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा सीजेआई सूर्य कांत को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित करने के विरोध से जुड़ा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BCI के पास छात्रों के व्यवहार को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है। इस निर्णय से नालसार के छात्रों को राहत मिली है, जिनका एनरोलमेंट बीसीआई के पूर्व आदेश के कारण अटका हुआ था। जानें इस विवाद की पूरी कहानी और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले के बारे में।
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सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के लॉ छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करने के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। गुरुवार को अदालत ने स्पष्ट किया कि बीसीआई के पास कानून के तहत छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है। इसके साथ ही, कोर्ट ने हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों से संबंधित बीसीआई के दो नोटिफिकेशन्स को रद्द कर दिया। यह मामला यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने के विरोध से जुड़ा था।


नालसार विवाद की शुरुआत

विवाद तब शुरू हुआ जब नालसार यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्य कांत को आमंत्रित करने पर आपत्ति जताई। छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन से इस निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की, यह कहते हुए कि उनका विरोध किसी व्यक्ति या न्यायिक पद के अपमान के लिए नहीं था, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की चिंता से संबंधित था।


छात्रों ने 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई से संबंधित सुनवाई के दौरान सीजेआई की कुछ टिप्पणियों का भी उल्लेख किया। विभिन्न बैच के छात्रों ने इस मुद्दे को कई बार यूनिवर्सिटी के सामने रखा। पहली बार 23 जुलाई को छात्रों ने यह मुद्दा उठाया। उनका तर्क था कि सीजेआई को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाना यूनिवर्सिटी की संविधान, न्याय तक पहुंच और शिकायतों को गंभीरता से सुनने की प्रतिबद्धता के खिलाफ है।


BCI का सख्त निर्णय

विवाद तब और बढ़ गया जब बीसीआई के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि नालसार के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स को वकील के रूप में एनरोल न किया जाए। बीसीआई ने यूनिवर्सिटी से उन छात्रों की रिपोर्ट भी मांगी, जिन्होंने सीजेआई की दीक्षांत समारोह में उपस्थिति के खिलाफ अभियान चलाया।


बीसीआई ने अपने प्रारंभिक निर्देश में कहा था कि 2026 में लॉ की डिग्री प्राप्त करने वाले नालसार के छात्रों को अगले आदेश तक किसी राज्य बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत नहीं किया जाएगा। काउंसिल ने यह भी तर्क किया कि सर्वोच्च न्यायिक पद के प्रति सम्मान न रखने वाला व्यक्ति जिम्मेदार वकील या न्यायाधीश बनने के योग्य नहीं हो सकता।


आदेश की आलोचना

बीसीआई ने बाद में कुछ शिक्षकों पर आरोप लगाया कि उन्होंने छात्रों को गुमराह किया और विरोध के लिए उकसाया। हालांकि, इस फैसले की कानूनी क्षेत्र में आलोचना हुई। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने बीसीआई के कदम को मनमाना और गैर-कानूनी बताया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह छात्रों के विरोध का समर्थन नहीं करते हैं।


BCI का संशोधित आदेश

आलोचना के बाद, बीसीआई ने कुछ ही घंटों में अपना प्रारंभिक आदेश वापस ले लिया। संशोधित संदेश में मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि काउंसिल ने पूरे मामले पर चर्चा के बाद अपने पहले निर्देश में बदलाव किया है। उन्होंने कहा कि नालसार के 2026 बैच के अधिकांश छात्र निर्दोष थे।


संशोधित फैसले के बाद, 2026 बैच के छात्रों को बार काउंसिल में एनरोलमेंट की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति मिल गई। इस बीच, बीसीआई ने नालसार यूनिवर्सिटी से मांगी गई जांच रिपोर्ट का इंतजार करने का निर्णय लिया।


सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

अब सुप्रीम कोर्ट ने बीसीआई के दोनों नोटिफिकेशन्स को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि लॉ छात्रों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए काउंसिल के पास कानूनी अधिकार नहीं है। इस निर्णय से नालसार के छात्रों को बड़ी राहत मिली है, जिनका एनरोलमेंट बीसीआई के प्रारंभिक निर्देश के कारण अटका हुआ था।