सुप्रीम कोर्ट का लिव-इन रिलेशनशिप पर महत्वपूर्ण फैसला
लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी सुरक्षा का अधिकार
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्तियों के अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी साथी के प्रति होने वाली क्रूरता से सुरक्षा का अधिकार केवल वैवाहिक संबंधों तक सीमित नहीं होना चाहिए। सामाजिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए, कानून की व्याख्या को भी समय के साथ विकसित होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्तियों को भी अपने साथी या उनके परिवार के सदस्यों द्वारा उत्पीड़न और क्रूरता के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्राप्त होनी चाहिए। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A को केवल विवाहित संबंधों तक सीमित न मानने की आवश्यकता पर जोर दिया, बल्कि इसके उद्देश्य और सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर देखने की बात की।
धारा 498-A उन मामलों में कानूनी कार्रवाई का प्रावधान करती है, जहां पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता की जाती है। यदि दोष सिद्ध होता है, तो तीन साल तक की जेल और जुर्माना लगाया जा सकता है। इस कानून में क्रूरता के अंतर्गत ऐसे शारीरिक या मानसिक व्यवहार शामिल हैं, जो किसी महिला को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं या आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकते हैं। दहेज या संपत्ति की मांग को लेकर उत्पीड़न भी इसमें शामिल है।
अदालत ने यह भी माना कि रिश्तों की प्रकृति में बदलाव के साथ कानूनी सुरक्षा का दायरा भी व्यावहारिक और संवेदनशील होना चाहिए। इस निर्णय के बाद, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्तियों को उत्पीड़न के मामलों में न्याय पाने के लिए एक मजबूत कानूनी आधार मिलने की उम्मीद है।
