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सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी कानून की समीक्षा याचिका को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून की समीक्षा की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने इस कानून के दुरुपयोग का आरोप लगाया था, लेकिन अदालत ने कहा कि इसे पहले ही तीन जजों की बेंच ने सही ठहराया है। जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि किसी एक व्यक्ति के मामले के आधार पर कानून की समीक्षा नहीं की जा सकती। जानें इस महत्वपूर्ण निर्णय के बारे में और क्या कहा गया अदालत में।
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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून की समीक्षा की मांग करने वाली याचिका को सुनने से इनकार कर दिया है। इस याचिका में इस कानून की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें इसे संविधान का उल्लंघन बताया गया था।


याचिकाकर्ता के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इसमें सजा की दर बहुत कम है, जबकि गलत मामलों में करोड़ों का मुआवजा दिया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि 2020 में इस कानून की कुछ धाराओं को निरस्त करने के बाद इसे फिर से संसद द्वारा लागू किया गया था।


सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, 'किसी एक व्यक्ति के साथ हुई घटना या कथित दुरुपयोग के आधार पर उस कानून की समीक्षा नहीं की जा सकती, जिसे पहले ही तीन जजों की बेंच ने सही ठहराया है।' उन्होंने यह भी कहा कि जब तीन जज उस कानून को मंजूरी दे चुके हैं, तो उसे केवल पांच साल के भीतर फिर से क्यों परखा जाए?


बेंच के अध्यक्ष चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यदि कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग होता है, तो अदालत अपने न्यायिक अधिकारों का उपयोग करके ऐसे मामलों का समाधान कर सकती है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग होना इसका मतलब नहीं है कि पूरा कानून गलत है।