सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो सेवा और हिरासत पर सुनवाई की
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद करने और ट्रेनें रद्द करने के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को सुनवाई की। इस मामले में नेताओं की हिरासत के खिलाफ दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी चर्चा हो रही है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच इन मामलों की सुनवाई कर रही है.
याचिकाकर्ताओं का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी और अन्य वकीलों ने बताया कि शनिवार को मेट्रो सेवा प्रभावित रही, नई दिल्ली और निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन बंद रहे, इंटरनेट सेवा ठप कर दी गई और दिल्ली में कर्फ्यू जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। उन्होंने यह भी कहा कि हजारों लोगों को बिना किसी कारण हिरासत में लिया गया, जिनमें विपक्षी नेता और सांसद भी शामिल थे.
सरकार का जवाब
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मेट्रो सेवा पूरी तरह से बंद नहीं हुई थी। उन्होंने बताया कि कुल ट्रेनों की संख्या सामान्य रही और रात 10 बजे के बाद सभी स्टेशन खोल दिए गए। उनका दावा था कि हिरासत में लिए गए लोगों को शाम को छोड़ दिया गया था। अदालत ने राज्य सरकार को मंगलवार तक हिरासत के हालात, तरीकों और उनके औचित्य पर जवाब देने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
सुनवाई के दौरान, अदालत ने कहा कि मेट्रो सामान्य रूप से चलती रहनी चाहिए, लोगों की आवाजाही में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए, इंटरनेट सेवा बहाल की जानी चाहिए और वकीलों को अपने कार्य करने से नहीं रोका जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये दिशा-निर्देश सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन रहेंगे। अगली सुनवाई मंगलवार को होगी, जिसमें सरकार को पूरा जवाब और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी.
कानून की समानता
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा का अधिकार सभी के लिए समान है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत किसी व्यक्ति की पहचान नहीं देखती। चाहे वह पुलिस अधिकारी हो, वकील हो या आम नागरिक, सभी के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा को अदालत समान महत्व देती है.
सरकार से जवाब की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे हिरासतों और प्रतिबंधों के बड़े पैमाने की चिंता है। इसलिए, वह सरकार और अन्य पक्षों की बात सुनना चाहती है। कोर्ट ने एक वकील से कहा कि पुलिस अधिकारियों का कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार राज्य की नीति से ऊपर नहीं है और उन्हें सॉलिसिटर जनरल की मदद करनी चाहिए.
