सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर केंद्र सरकार का बचाव
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का मामला
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार ने मौजूदा व्यवस्था का समर्थन किया है। सरकार ने कहा कि प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की चयन समिति पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है। इसके अनुसार, न्यायालय को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि कार्यपालिका लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ कार्य करेगी।
प्रधानमंत्री की गरिमा का बचाव
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में यह तर्क दिया कि प्रधानमंत्री के पद की संवैधानिक गरिमा और विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के निर्णय पर विश्वास नहीं किया जाएगा, तो मंत्रिमंडल के गठन में किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति को शामिल करने की मांग भी उठाई जा सकती है। उनका कहना था कि संसद द्वारा बनाए गए कानून पर सवाल उठाना विधायी समझ और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास जताने जैसा होगा।
संविधान पीठ को भेजने की मांग
केंद्र सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाए। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 की व्याख्या और संसद की विधायी शक्तियों से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न इस मामले में शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि यदि 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अंतिम मान लिया जाए, तो संसद के पास इस विषय पर कानून बनाने की वास्तविक शक्ति सीमित हो जाएगी।
निष्पक्षता पर अदालत का जोर
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला प्रधानमंत्री पर अविश्वास का नहीं है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि अदालत प्रधानमंत्री पर पूरा भरोसा करती है, लेकिन चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में निष्पक्षता दिखानी चाहिए। उनका कहना था कि चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है और नियुक्ति प्रक्रिया से जनता का विश्वास मजबूत होना चाहिए।
2023 के कानून पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2023 का कानून सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए फैसले की भावना के विपरीत है। पहले अदालत ने अंतरिम व्यवस्था के तहत प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति से नियुक्ति का निर्देश दिया था। बाद में संसद ने नया कानून बनाकर मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया, जिससे सरकार को समिति में बहुमत मिल गया। इस बदलाव की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
फैसला सुरक्षित
दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अदालत अब इस प्रारंभिक प्रश्न पर विचार करेगी कि क्या इस चुनौती को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। साथ ही, दोनों पक्षों को लिखित दलीलें दाखिल करने की अनुमति भी दी गई है। इस मामले में अदालत का अगला फैसला चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
