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सुप्रीम कोर्ट में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर बहस: मदरसों और धार्मिक स्कूलों को RTE अधिनियम में लाने की मांग

सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता और समानता को लेकर मदरसों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को RTE अधिनियम के दायरे में लाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। याचिका में संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का उल्लंघन होने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ता ने सभी स्कूलों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता लागू करने की मांग की है। यह मामला 2025 में आए एक महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ा है, जिसमें अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई से छूट दी गई थी।
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नई दिल्ली में कानूनी बहस का आगाज़


नई दिल्ली: देश में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता और समानता को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मदरसों, संस्कृत स्कूलों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009' (RTE Act) के दायरे में लाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति जताई है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार करने का निर्णय लिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार के अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे जिया खान द्वारा दायर याचिका पर यह कदम उठाया है।


आरटीई कानून की धाराओं पर उठे सवाल

याचिका में यह कहा गया है कि ये धाराएं संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार) का उल्लंघन करती हैं।


वर्तमान में धारा 1(4) के तहत यह कानून अनुच्छेद 29 और 30 में मिलने वाले अल्पसंख्यक अधिकारों के अधीन काम करता है, जबकि धारा 1(5) मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों को इस कानून के सीधे नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त रखती है।


भेदभाव का मुद्दा

याचिका में अदालत से यह निर्देश देने का आग्रह किया गया है कि राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा निर्धारित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता सभी प्रकार के स्कूलों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वर्तमान छूट के कारण बच्चों के साथ केवल इस आधार पर भेदभाव हो रहा है कि वे किस प्रकार के स्कूल में पढ़ रहे हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार हर बच्चे का है। शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने से अल्पसंख्यक संस्थानों के अपने अधिकार प्रभावित नहीं होते, बल्कि इससे योग्य उम्मीदवारों के चयन में पारदर्शिता और शिक्षा के स्तर में सुधार आएगा। इस पूरे मामले को पुनर्विचार के लिए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजने और बड़ी संविधान पीठ गठित करने की सिफारिश की गई थी।


कानूनी पृष्ठभूमि और बड़ी पीठ की सिफारिश

यह जनहित याचिका सितंबर 2025 में आए अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि में दायर की गई है। उस समय जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने 2014 के प्रमाती एजुकेशनल ट्रस्ट मामले में दिए गए 5 जजों की संविधान पीठ के फैसले पर सवाल उठाए थे, जिसमें अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई से पूरी छूट दी गई थी।


2025 में अदालत ने माना था कि भले ही 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के प्रवेश संबंधी नियम को लेकर छूट का तर्क समझा जा सकता हो, लेकिन शिक्षकों की योग्यता और पढ़ाई के मानकों से जुड़े सुरक्षात्मक नियमों से धार्मिक या अल्पसंख्यक संस्थानों को पूरी तरह बाहर रखना न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर इस पूरे मामले को पुनर्विचार के लिए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजने और बड़ी संविधान पीठ गठित करने की सिफारिश की गई थी।