सुप्रीम कोर्ट में बच्चों के अपहरण पर जनहित याचिका दायर, सख्त कानून की मांग
बच्चों के अपहरण पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
नई दिल्ली - देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ती घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका प्रस्तुत की गई है। इस याचिका में कानून को और अधिक सख्त बनाने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह याचिका वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई है।
याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि देश में अवैध गोद लेने का एक संगठित रैकेट सक्रिय है। इसके साथ ही, इंटरस्टेट चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क भी काम कर रहा है। बच्चों का अपहरण शोषण और 'बॉडी पार्ट' की ट्रेडिंग के लिए किया जा रहा है। यहां तक कि मेडिकल ट्रायल के लिए भी बच्चों का बड़े पैमाने पर अपहरण हो रहा है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि पुलिस लापता, किडनैप और अगवा हुए बच्चों के मामलों में तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं करती और जांच में भी तेजी नहीं दिखाती। जांच में देरी और लंबे ट्रायल के कारण संगठित किडनैपिंग माफिया को अपने गैर-कानूनी धंधे को बढ़ाने में मदद मिलती है।
याचिका में कई महत्वपूर्ण मांगें की गई हैं, जिनमें बच्चों के अपहरण की जांच पुलिस के एसीपी या एसएचओ स्तर के अधिकारियों द्वारा करने, अपहरण के मामलों को एक साल के भीतर निपटाने के लिए विशेष अदालतों का गठन करने और अपहरणकर्ताओं के परिवार के सदस्यों की संपत्ति जब्त करने की बातें शामिल हैं।
याचिका में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए हैं। 1 जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 2013 से बिहार में हर साल लगभग 15,000 मिसिंग केस दर्ज होते हैं, जिनमें से अधिकांश बच्चे होते हैं और मुश्किल से 50 प्रतिशत बच्चे ही वापस मिल पाते हैं। एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, मानव तस्करी के सबसे अधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज हुए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी के सबसे अधिक मामले ओडिशा में हैं, जबकि नाबालिग लड़कियों की तस्करी में राजस्थान का नाम सबसे ऊपर है। इन बच्चों को भीख मंगवाने, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति और अन्य अवैध गतिविधियों में धकेला जाता है। याचिका में 5 जून 2026 की एक घटना का भी उल्लेख है, जब दिल्ली पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार, यह नेटवर्क 5 राज्यों - दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में सक्रिय था। यह गिरोह ईडब्ल्यूएस और बीपीएल परिवारों से नवजात बच्चों का अपहरण कर उन्हें अवैध कामों के लिए 8 से 10 लाख रुपए में बेच रहा था।
