सूर्य ग्रहण 2026: अद्भुत खगोलीय घटना और पौराणिक मान्यताएँ
सूर्य ग्रहण का महत्व
सूर्य ग्रहण 2026: सूर्य ग्रहण एक अद्भुत खगोलीय घटना है, जो तब होती है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है। यह घटना पूर्ण, आंशिक या वलयाकार (रिंग ऑफ फायर) रूप में हो सकती है। खगोलविदों और ज्योतिषियों के बीच इस ग्रहण को लेकर विशेष उत्साह रहता है। भारतीय समयानुसार, यह ग्रहण रात 09:04 बजे शुरू होगा, जबकि इसका मध्य समय (पीक टाइम) रात 11:16 बजे होगा। ग्रहण का समापन 13 अगस्त को रात 01:27 बजे होगा। यह ग्रहण कर्क राशि में अश्लेषा नक्षत्र में लगेगा। चूंकि यह रात में होगा, इसलिए भारत में इसे नहीं देखा जा सकेगा, और इस कारण इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा।
पौराणिक ग्रंथों में सूर्य ग्रहण का उल्लेख
पौराणिक ग्रंथों में सूर्य ग्रहण:
मत्स्य और पद्म पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब क्षीर सागर से अमृत निकला, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया।
विष्णु जी का सुदर्शन चक्र
विष्णु जी ने चलाया सुदर्शन चक्र:
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत बांटते समय स्वरभानु नामक असुर ने देवताओं के बीच बैठकर अमृत का एक घूंट पिया। जब सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया, तो विष्णु जी ने तुरंत सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया।
राहु और केतु की उत्पत्ति
सिर 'राहु' और धड़ 'केतु':
अमृत स्वरभानु के गले तक पहुँच चुका था, इसलिए उसकी मृत्यु नहीं हुई। उसका सिर 'राहु' और धड़ 'केतु' नाम की छाया योनि (ग्रह) बने।
सूर्य और चंद्रमा के बीच पुरानी दुश्मनी
सूर्य और चंद्रमा से पुरानी दुश्मनी:
ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राहु-केतु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसते हैं, जिसे हम सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण कहते हैं।
ऋग्वेद में सूर्य ग्रहण का उल्लेख
ऋग्वेद:
सूर्य ग्रहण का सबसे पहला लिखित उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जिसमें महर्षि अत्रि द्वारा सूर्य के अज्ञान और अंधकार को दूर करने वाले मंत्रों का वर्णन किया गया है।
ग्रहण काल में धार्मिक मान्यताएँ
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण काल में किया गया जप, ध्यान और दान सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है। इस दौरान जल को गंगाजल के समान पवित्र माना जाता है।
