Newzfatafatlogo

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के खिलाफ बढ़ती शिकायतें: संसद में उठे सवाल

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा मरीजों के इलाज के खर्च को उठाने से मना करने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे संसद में सवाल उठाए जा रहे हैं। सांसद देवेश शाक्य ने स्वास्थ्य मंत्रालय से पूछा कि क्या सरकार को पता है कि बीमा कंपनियां डॉक्टरों की सलाह पर अस्पताल में भर्ती के क्लेम को खारिज कर रही हैं। इस मुद्दे पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं, जिनका जवाब स्वास्थ्य मंत्रालय ने दिया है। जानें इस विवाद का पूरा सच और क्या सुधार की उम्मीद है।
 | 

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की शिकायतें

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा कई बार बीमा धारकों से उच्च प्रीमियम वसूलने के बाद, मरीजों के इलाज के खर्च को उठाने से इनकार करने की घटनाएं सामने आई हैं। हर साल सैकड़ों ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां पीड़ित शिकायत करते हैं कि उनके पास बीमा होने के बावजूद, कंपनियों ने अस्पताल के खर्च का भुगतान करने से मना कर दिया। इस मुद्दे पर विवाद इतना बढ़ गया है कि अब संसद में भी जन प्रतिनिधि सवाल उठा रहे हैं।


सांसद का सवाल

लोकसभा सांसद देवेश शाक्य ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से पूछा कि क्या सरकार को पता है कि प्राइवेट स्वास्थ्य बीमा कंपनियां डॉक्टरों की सलाह पर अस्पताल में भर्ती होने के क्लेम को अक्सर 'इलाज की आवश्यकता नहीं' या 'पॉलिसी में शामिल नहीं' जैसे कारणों से खारिज कर देती हैं। इससे मरीजों के इलाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।


सरकार के सामने तीन महत्वपूर्ण सवाल

क्या सरकार को जानकारी है कि प्राइवेट स्वास्थ्य बीमा कंपनियां विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह पर अस्पताल में भर्ती होने के क्लेम को 'नॉन मेडिकल नेसेसिटी' या शर्तों से बाहर होने के आधार पर खारिज कर रही हैं, जिससे मरीजों के इलाज पर बुरा असर पड़ रहा है?


क्या इंश्योरेंस कंपनियों के लिए क्लिनिकल और मेडिकल फैसलों में दखल देने से रोकने के लिए कोई राष्ट्रीय मानक गाइडलाइन या मेडिकल ऑडिट सिस्टम प्रस्तावित किया गया है?


क्या सरकार, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) और स्वास्थ्य क्षेत्र के रेगुलेटर के साथ मिलकर, डॉक्टर के क्लिनिकल फैसले को प्राथमिकता देने के लिए किसी अनिवार्य नीति पर विचार कर रही है?


नॉन मेडिकल नेसेसिटी और एक्सक्लूजन की परिभाषा

बीमा कंपनियां केवल इलाज के खर्च को कवर करती हैं, न कि इलाज से संबंधित अन्य खर्चों को। यदि कोई मरीज अस्पताल में भर्ती है और दस्ताने, टिश्यू जैसे सामान को 'नॉन मेडिकल आइटम' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, तो बीमा कंपनी उसका खर्च नहीं उठाएगी।


स्वास्थ्य बीमा में एक्सक्लूजन का मतलब है कि कुछ बीमारियां, इलाज, या मेडिकल कंडीशन आपकी पॉलिसी में कवर नहीं होतीं। ऐसे मामलों में बीमा कंपनी क्लेम नहीं देती, और खर्च आपको खुद उठाना पड़ता है।


स्वास्थ्य मंत्रालय का जवाब

स्वास्थ्य मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने बताया कि इंश्योरेंस कंपनियां हर क्लेम को पॉलिसी के नियमों, मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड, डॉक्टर की राय और मानक उपचार प्रोटोकॉल के आधार पर देखती हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि IRDAI फिलहाल कोई नया नियम बनाने की योजना नहीं बना रही है, जिसमें डॉक्टर की क्लिनिकल राय को प्राथमिकता दी जाए।


क्लेम खारिज होने के आंकड़े

सरकार ने कहा है कि IRDAI कुल क्लेम खारिज होने का डेटा रखती है, लेकिन 'नॉन मेडिकल नेसेसिटी' या 'एक्सक्लूजन' जैसे खास कारणों का अलग से रिकॉर्ड नहीं रखती। पिछले तीन वर्षों में कंपनी-वार कितने क्लेम इन्हीं वजहों से रद्द हुए, इसका ब्योरा उपलब्ध नहीं है।


क्या सुधार की उम्मीद है?

सरकार ने स्पष्ट किया है कि कंपनियां अपने पॉलिसी के अनुसार निर्णय लेंगी, और डॉक्टर की राय को प्राथमिकता देने का कोई नया नियम अभी नहीं लाया जाएगा।


आंकड़ों की कमी का प्रभाव

IRDAI और सरकार का मानना है कि उनके पास 'नॉन मेडिकल नेसेसिटी' और एक्सक्लूजन के आधार पर खारिज हुए बीमा के दावों का अलग से डेटा नहीं है। जिस संस्था को बीमा धारक के हितों की निगरानी करनी है, उसके पास यह जानने के लिए कोई विभाग नहीं है कि कितने मरीज इन आधारों पर ठुकराए जा सकते हैं।


IRDAI के क्लेम सेटलमेंट के आंकड़े

IRDAI ने अपनी सालाना रिपोर्ट 2024-25 में टर्म इंश्योरेंस और स्वास्थ्य बीमा के क्लेम सेटलमेंट और रिजेक्शन से जुड़े आंकड़े साझा किए हैं। हालांकि, 'नॉन मेडिकल नेसेसिटी' और 'एक्सक्लूजन' के आंकड़े अलग से नहीं बताए गए हैं।


ग्रुप पॉलिसी में सफलता

ग्रुप पॉलिसियों में स्थिति और बेहतर रही, जहां 16.33 लाख क्लेम में से 99.68 प्रतिशत क्लेम सफलतापूर्वक सेटल हो गए। स्वास्थ्य बीमा में कुल 3.72 करोड़ क्लेम दर्ज किए गए, जिनमें से 87.5 प्रतिशत क्लेम संख्या के आधार पर सेटल कर दिए गए।


चुनौतियाँ

लाइफ इंश्योरेंस में क्लेम 98 प्रतिशत से अधिक मामलों में आसानी से मिल रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य बीमा में 87 प्रतिशत से अधिक क्लेम सेटल हो रहे हैं। स्वास्थ्य बीमा में अभी भी कुछ क्लेम खारिज या लंबित रहने की समस्या बनी हुई है, जिसके लिए पॉलिसी शर्तों का पालन और सही दस्तावेज जमा करना बहुत जरूरी है।