Newzfatafatlogo

इंदौर का खजराना सिविल अस्पताल: कागजों पर मौजूद, वास्तविकता में गायब

इंदौर का खजराना सिविल अस्पताल, जिसे 2020 में मंजूरी मिली थी, अब तक केवल कागजों पर ही मौजूद है। न तो इसकी कोई इमारत है और न ही कोई भूमि। 87 सरकारी पदों की स्वीकृति के बावजूद, अस्पताल में कभी कोई मरीज भर्ती नहीं हुआ। इस स्थिति पर कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए हैं, इसे प्रशासनिक विफलता और घोटाले का मामला बताया है। जानें इस अस्पताल की पूरी कहानी और इसके पीछे की सच्चाई।
 | 

खजराना सिविल अस्पताल की स्थिति


इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में एक अस्पताल है, जहां डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन और फार्मासिस्ट कार्यरत हैं। लेकिन, यह अस्पताल केवल कागजों पर ही मौजूद है, वास्तविकता में इसका कोई अस्तित्व नहीं है।


खजराना सिविल अस्पताल को 2020 में स्वीकृति मिली थी, लेकिन इसके पास न तो कोई भूमि है और न ही कोई इमारत। इसके नाम पर 87 सरकारी पदों को मंजूरी दी गई है, नियुक्तियां हो चुकी हैं, और तबादले भी जारी हैं। हाल ही में, 15 जून, 2026 को एक प्रयोगशाला तकनीशियन का तबादला किया गया है, जबकि अस्पताल में कभी कोई मरीज भर्ती नहीं हुआ।


23 जून, 2020 को मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर के खजराना क्षेत्र में 100 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल को मंजूरी दी थी। इस अस्पताल से खजराना, मूसाखेड़ी, तेजाजी नगर, बिचोली हप्सी और आसपास के क्षेत्रों के तीन लाख से अधिक निवासियों को लाभ मिलने की उम्मीद थी। यह एमवाई अस्पताल, एमटीएच अस्पताल और जिला अस्पताल पर बोझ को कम करने में भी मदद करता।


सरकार ने इस परियोजना के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों, चिकित्सा अधिकारियों, स्टाफ नर्सों, फार्मासिस्टों, प्रयोगशाला तकनीशियनों और सहायक कर्मचारियों सहित 87 पदों को स्वीकृत किया। लेकिन, छह साल बाद भी अस्पताल का मामला सरकारी रिकॉर्ड में ही अटका हुआ है। भूमि आवंटन न होने के कारण निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है।


इंदौर का खजराना सिविल अस्पताल: कागजों पर मौजूद, वास्तविकता में गायब


अधिकारियों का कहना है कि स्वीकृत कर्मचारियों को इंदौर के विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात किया गया है। कागजों पर, ये कर्मचारी खजराना सिविल अस्पताल से जुड़े हुए हैं, लेकिन वास्तविकता में अस्पताल का कोई अस्तित्व नहीं है।


खजराना और आसपास के निवासियों को इलाज के लिए शहर के अन्य सरकारी अस्पतालों में जाना पड़ता है। यदि अस्पताल समय पर बन जाता, तो इंदौर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों पर दबाव कम हो जाता।


सरकार का बयान


उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने कहा कि मूल प्रस्ताव में बदलाव हुआ है। पहले यह एक शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था, जिसे बाद में 50 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल में अपग्रेड किया गया। लेकिन, भूमि की कमी के कारण निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। स्वीकृत पद विभागीय पोर्टल पर दिख रहे हैं।


मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव हसनी ने भी पुष्टि की कि अस्पताल के साथ-साथ पदों को भी मंजूरी दी गई है। उन्होंने कहा कि विभाग समय पर उपयुक्त सरकारी भूमि का कब्जा नहीं कर सका।


कांग्रेस का आरोप



कांग्रेस ने इसे प्रशासनिक विफलता का गंभीर मामला बताया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन सिंह वर्मा ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा घोटाला है।


खजराना अस्पताल संघर्ष समिति के अध्यक्ष अरशद मिर्जा बेग ने कहा कि अस्पताल की मांग 2018 में उठाई गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीन उपलब्ध है, लेकिन विभाग बहाने बना रहा है।